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संजीव को जीवन:आईजीएमसी में बाईपास सर्जरी नहीं, इंट्रावेस्क्युलर लिथोट्रिप्सी से मरीज की ब्लॉक हुई तीन नसें खोली

शिमला5 दिन पहले
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इंट्रावैस्कुलर लिथोट्रिप्सी से मरीज संजीव का इलाज करने वाली आईजीएमसी के कार्डियोलॉजी डिपार्टमेंट की टीम। - Dainik Bhaskar
इंट्रावैस्कुलर लिथोट्रिप्सी से मरीज संजीव का इलाज करने वाली आईजीएमसी के कार्डियोलॉजी डिपार्टमेंट की टीम।
  • पहली बार यहां इस तकनीक से सर्जरी, नसों में कैल्शियम ज्यादा होने से इलाज संभव नहीं था
  • नसों में वायर डालकर कैथेटर से दी शॉक वेव्ज, टूटा पत्थरनुमा कैल्शियम

आमतौर पर किसी व्यक्ति की तीनों नसें (आर्टरीज) ब्लॉक होने पर उसकी बाईपास सर्जरी करनी पड़ती है। लेकिन आईजीएमसी के डाक्टरों ने एक मरीज की ब्लॉक तीनों नसों को इंट्रावैस्कुलर लिथोट्रिप्सी (आईवीएल) टेक्नीक से खोलने में कामयाबी हासिल की है। यह मरीज ओपन हार्ट सर्जरी के लिए फिट नहीं था, ऐसे में इसको पीजीआई, एम्स जैसे बड़े मेडिकल संस्थान को भेजना पड़ता। लेकिन कार्डियोलॉजी डिपार्टमेंट के डॉक्टरों ने नई आईवीईल तकनीक से इस मरीज की ब्लॉक नसों को खोलकर उसकी जान बचाई। मरीज अब पूरी तरह से स्वस्थ है।

शिमला के 50 साल के मरीज विनोद कुमार को 27 दिसंबर को हार्ट अटैक के बाद आईजीएमसी लाया गया था। एंजियोग्रॉफी से पता चला कि मरीज की तीनों नसें में कैल्शियम जमा है। इससे नसों को स्टेंट डालकर खोलना भी संभव नहीं था। ऐसे में एक विकल्प मरीज की बाईपास सर्जरी का था, मगर दिक्कत यह थी कि मरीज इसके लिए फिजिकल फिट नहीं था।

मरीज बाहर जाकर इलाज करने की स्थिति में नहीं था। ऐसे में कार्डियोलॉजी के डॉक्टरों ने आईवीएल तकनीक से इलाज करने का फैसला लिया। इसके लिए आईवीएल कैथेटर की जरूरत थी, जिसकी कीमत करीब 2.50 लाख की है। मरीज इसे चुकाने की स्थिति में नहीं था। ऐसे में डाक्टरों ने अस्पताल के एमएस डॉ. जनकराज के समक्ष इस केस को रखा।

डॉ. जनकराज ने आयुष्मान योजना के तहत मरीज का खर्च उठाने का फैसला लिया। इसके बाद आईवीएल कैथेटर चंडीगढ़ से मंगवाया गया। इसके साथ ही इसमें काम आने वाले एक अन्य उपकरण ऑप्टिकल कोहेरेंट टोमोग्राफी (ओसीटी) को चंडीगढ़ से अरेंज करवाया गया। इसके बाद मरीज का सफलतापूर्वक इलाज किया गया। इलाज में करीब 3.50 लाख का खर्च आया है, जो कि आयुष्मान योजना के तहत किया गया।

फिर डाला जाता है स्टेंटः इंट्रावैस्कुलर लिथोट्रिप्सी तकनीक में मरीज की ब्लॉक नसों में वायर डालकर आईवीएल कैथेटर से शॉक वेव्ज पैदा की जाती है। इससे नसों में जमा पत्थरनुमा कैल्शियम टूट जाता है। इसके बाद स्टेंट डालकर बंद नसों को खोल दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया को ऑप्टिकल कोहेरेंट टोमोग्रफी (ओसीटी) उपकरण की मदद से किया जाता है जिसमें यह प्रोसेस दिखता है।

पीजीआई, एम्स में संभवः आईवीएल कैथेटर व ओसीटी आने के बाद कार्डियोलॉजी डिपार्टमेंट के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. कुणाल महाजन की टीम ने सोमवार शाम को मरीज का इलाज शुरू किया। करीब पौने घंटे के भीतर मरीज की तीनों नसों की ब्लॉकेज को खोल दिया गया। हिमाचल में यह पहली बार है।

जिसमें इस तरह के रोगियों का इलाज में इस नई तकनीक से किया गया है। चिकित्सकों की मानें तो इस तरह के इलाज पीजीआई, एम्स समेत कुछेक बड़े प्राइवेट अस्पातल में होते हैं। नार्थ इंडिया में अभी तक इस तरह के करीब 30 से 40 आपरेशन ही हुई हैं।

हर माह आते हैं करीब 100 मरीजः हर माह अाईजीएमसी मंे करीब 100 मरीज हार्ट अटैक के आते हैं, जिनमें करीब 60 मरीजों की नसों में ब्लॉकेज रहती है। नसों में कैल्शियम जमा होने के हर माह औसतन दो मामले आते हैं। अब इनका आईवीएल तकनीक से यहीं इलाज किया जा सकेगा। डॉक्टरों के अनुसार इस तकनीक से इलाज का फायदा यह रहता है कि इसमें इलाज के ही बाद मरीज चलने फिरने लगता है। इसके विपरीत बाईपास सर्जरी वाले मरीज को कम के कम पांच दिन आईसीयू में रखने के बाद करीब दो सप्ताह तक अस्पताल में रखा जाता है।

डॉक्टर्स की इस टीम ने दिया शिमला के 50 साल के संजीव को जीवन

आईजीएमसी में इस तकनीक से इलाज करने वालों में कार्डियोलॉजी डिपार्टमेंट के एसोसिएट प्रो.नीरज गंजू, असिस्टेंट प्रो. कुणाल महाजन, असिस्टेंट प्रो. राजेश शर्मा, डा आशु गुप्ता व राहुल शामिल रहे। डॉ. कुणाल महाजन का कहना है कि अभी तक पीजीआई, एम्स जैसे बड़े अस्पतालों में आईवीएल तकनीक से इलाज किया जाता है।

आईजीएमसी में पहली दफा इस तकनीक से मरीज का सफल इलाज किया गया है। यही नहीं नार्थ इंडिया में भी अभी तक इस तकनीक से 30 से 40 मरीजों का ही इलाज किया गया है। इसमें आईजीएमसी प्रशासन का बड़ा सहयोग रहा है।

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