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मुहूर्त:लाेहड़ी जलाने के लिए आज शाम 6 बजे से रात 11ः42 बजे तक रहेगा

शिमला12 दिन पहले
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फाइल फोटो - Dainik Bhaskar
फाइल फोटो
  • मकर संक्रांति पर कल तत्तापानी में होगा पवित्र स्नान और तुलादान, कोलडैम में गर्म चश्मे हो चुके हैं जलमग्न, थोड़ी जगह हैं बचे

लाेहड़ी परंपरागत रूप से रबी फसलों की फसल से जुड़ा हुआ है और यह किसान परिवारों में सबसे बड़ा उत्सव भी है। पंजाबी किसान लोहड़ी के बाद वित्तीय नए साल के रूप में देखते हैं। आज लाेहड़ी जलाने का समय शाम 6 बजे से रात 11ः42 बजे तक शुभ है। ज्याेर्तिविद मदन गुप्ता का कहना है कि अग्नि प्रज्जवलन का शुभ मुहूर्त बुधवार सायंकाल 6 बजे से शुरू हाे रहा है।

लकड़ियां, समिधा, रेवड़ियां, तिल आदि सहित अग्नि प्रदीप्त करके अग्नि पूजन के रूप में लोहड़ी का पर्व मनाया जा सकता है। रात्रि 11 बजकर 42 मिनट तक ये मुहूर्त रहेगा। संपूर्ण भारत में लोहड़ी का पर्व धार्मिक आस्था, ऋतु परिवर्तन, कृषि उत्पादन, सामाजिक औचित्य से जुड़ा है। पंजाब में यह कृषि में रबी फसल से संबंधित है, मौसम परिवर्तन का सूचक तथा आपसी सौहार्द का परिचायक है।

इसलिए जलाते हैं लाेहड़ी

पंडिताें के अनुसार सायंकाल लोहड़ी जलाने का अर्थ है कि अगले दिन सूर्य का मकर राशि में प्रवेश पर उसका स्वागत करना है। सामूहिक रूप से आग जलाकर सर्दी भगाना और मूंगफली, तिल, गज्जक, रेवड़ी खाकर शरीर को सर्दी के मौसम में अधिक समर्थ बनाना ही लोहड़ी मनाने का उद्देश्य है। रेवड़ी मूंगफली का आदान प्रदान किया जाता है। इस तरह सामाजिक मेलजोल में इस त्योहार का महत्वपूर्ण योगदान है। इसके अलावा कृषक समाज में नव वर्ष भी आरंभ हो रहा है।

ये है परंपराः लोहड़ी पर घर-घर जाकर दुल्ला भट्टी के और अन्य तरह के गीत गाने की परंपरा है। बच्चे घर-घर लोहड़ी लेने जाते हैं और उन्हें खाली हाथ नहीं लौटाया जाता है। इसलिए उन्हें गुड़, मूंगफली, तिल, गजक या रेवड़ी दी जाती है। दिनभर घर-घर से लकड़ियां लेकर इकट्ठा की जाती हैं।

आजकल लकड़ी की जगह पैसे भी दिए जाने लगे हैं जिनसे लकड़ियां खरीदकर लाई जाती हैं और शाम को चौराहे या घरों के आसपास खुली जगह पर आग जलाई जाती है। उस अग्नि में तिल, गुड़ और मक्का को भोग के रूप में चढ़ाया जाता है। आग जलाकर लोहड़ी को सभी में बांटा जामा है। इस दौरान नृत्य व संगीत का दौर भी चलता है।

ये है परंपराः लोहड़ी पर घर-घर जाकर दुल्ला भट्टी के और अन्य तरह के गीत गाने की परंपरा है। बच्चे घर-घर लोहड़ी लेने जाते हैं और उन्हें खाली हाथ नहीं लौटाया जाता है। इसलिए उन्हें गुड़, मूंगफली, तिल, गजक या रेवड़ी दी जाती है। दिनभर घर-घर से लकड़ियां लेकर इकट्ठा की जाती हैं।

आजकल लकड़ी की जगह पैसे भी दिए जाने लगे हैं जिनसे लकड़ियां खरीदकर लाई जाती हैं और शाम को चौराहे या घरों के आसपास खुली जगह पर आग जलाई जाती है। उस अग्नि में तिल, गुड़ और मक्का को भोग के रूप में चढ़ाया जाता है। आग जलाकर लोहड़ी को सभी में बांटा जामा है। इस दौरान नृत्य व संगीत का दौर भी चलता है।

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