स्मृति शेष:नहीं रहे सच्चे मेडिकल प्राेफेशनल और गरीबाें के सच्चे हमदर्द डाॅ. संजीव शर्मा

शिमलाएक वर्ष पहले
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डॉ. संजीव शर्मा - Dainik Bhaskar
डॉ. संजीव शर्मा
  • उनके टीचर ने उन्हें साईं के नाम से इसलिए पुकारा था, क्योंकि उनके बाल घुंघराले थे

आईजीएमसी के रेडियाेलाॅजी डिपार्टमेंट के हेड प्राेफेसर. संजीव शर्मा अब हमारे बीच नहीं हैं। अब सिर्फ उनसे जुड़ी यादें ही बची हैं। साेमवार शाम उनका देहांत हाे गया। मेडिकल प्राेफेशन के साथियाें के अलावा शिमला शहर के ज्यादातर लाेग उन्हें साईं के नाम से ही जानते थे। डीएवी स्कूल लक्कड़ बाजार में नाैवीं क्लास में पढ़ते हुए डाॅ. संजीव शर्मा के हिंदी के टीचर मुन्नीलाल शर्मा ने पहली बार उन्हें साईं के नाम से इसलिए पुकारा था क्याेंकि उनके बाल बहुत ही ज्यादा घुंघराले थे। डाॅ. संजीव शर्मा ऐसे इंसान थे जाे गरीबाें की मदद से लेकर अस्पताल और अपने डिपार्टमेंट के लिए जरूरी और नए इक्यूपमेंट्स पाने के लिए हमेशा सरकार और ब्यूराेक्रेसी से मदद पाने की काेशिश में लगे रहे। 

क्रिकेट का ऐसा शाैक कि बैट हर समय साथ रहता था: डाॅ.कपूर
सेवानिवृत्त डाॅ. कमल कपूर ने बताया कि वह डीएवी शिमला से लेकर एमबीबीएस तक एकसाथ पढ़े। क्रिकेट के ऐसे शाैकिन थे कि एमबीबीएस के दाैरान वह कालेज में बैट साथ रखते थे। नौवीं क्लास में स्कूल के फुटबाॅल मैच देखने के लिए हम पांच दाेस्त शिमला से जुन्गा और वापिस शिमला पैदल ही पहुंच गए थे।

रेडियाेलाॅजी विभाग काे किया हाईटैक: डाॅ डीके वर्मा
आईजीएमसी के सर्जरी के विभागाध्यक्ष डाॅ. डीके वर्मा ने बताया कि बचपन से एमबीबीएस और आईजीएमसी तक का सफर उनका एक साथ बीता है। सबसे बड़ा याेगदान उनका आईजीएमसी में रेडियाेलाॅजी विभाग काे स्टैंड करने का है। उन्हें विभाग काे हाईटैक बनाने के लिए सब प्रयास किए और यहां हाईटैक मशीनें उन्हीं की देन हैं।

सबकी मदद के लिए रहते थे तैयार:डाॅ. दिग्विजय
नेरचाैक मेडिकल कालेज मंडी के माइक्राेबाॅयाेलाॅजी विभागाध्यक्ष डाॅ. दिग्विजय ने बताया कि एमबीबीएस में उन्हाेंने एक साथ पढ़ाई की। डाॅ. संजीव काफी चीयरफुल पर्सन थे । पांच साथ के दाैरान उन्हाेंने ना ताे किसी स्टूडेंट से झगड़ा किया और ना ही किसी काे परेशान। जब मदद की बात आती थी ताे सबसे पहले खड़े हाे जाते थे।

पहली ओपन हार्ट सर्जरी में इन्हीं का याेगदान सबसे ज्यादा:डाॅ. रजनीश पठानिया
आईजीएमसी के प्रिंसिपल डाॅ. रजनीश पठानिया ने बताया कि हमने एक श्रेष्ठ डाॅक्टर काे खाे दिया है। 2005 में जब पहली ओपन हार्ट सर्जरी आईजीएमसी में हुई ताे डाॅ. संजीव ने ही सबसे ज्यादा याेगदान दिया। वह कई दिनाें तक इस सर्जरी काे लेकर मदद करते रहे। अभी भी आईजीएमसी के न्यू ओपीडी ब्लाॅक काे शुरू करने के लिए पूरी डाॅक्यूमेंट प्रक्रिया यही करवा रहे थे। आईजीएमसी और रेडियाेलाॅजी विभाग की बेहतरी के लिए इन्हाेंने कई बेहतर कार्य किए हैं।

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