हिमाचल के कमल किशोर को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार:खंडहर हो चुके स्कूल की तस्वीर ऐसे बदली, बच्चे कहते हैं- हमें वहीं दाखिला चाहिए; घर-घर जाकर भी शिक्षित करते हैं

सोलन/शिमला3 महीने पहले
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हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले के कंडाघाट में राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला कल्होग के प्रधानाचार्य कमल किशोर को 5 सितंबर को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सम्मान समारोह शिमला में सुबह 10 बजे वर्चुअली हुआ। पहले उन्हें हिमाचल सचिवालय में ऑनलाइन राष्ट्रपति ने सम्मानित किया। इसके बाद राज्य के मुख्य अतिथि परिसर पीटरहॉफ में चल रहे राज्य स्तरीय टीचर सम्मान समारोह में हिमाचल के शिक्षा सचिव राजीव शर्मा की ओर से सम्मानित किया गया। वहीं पुरस्कार मिलने से प्रधानाचार्य कमल किशोर काफी खुश हैं।

प्रधानाचार्य कमल किशोर को सम्मानित करते शिक्षा सचिव राजीव शर्मा।
प्रधानाचार्य कमल किशोर को सम्मानित करते शिक्षा सचिव राजीव शर्मा।

आइए जानते हैं उन्होंने आज तक क्या-क्या किया...

कमल किशोर ने पूरी तरह से खंडहर हो चुके कल्होग स्कूल के भवन की तस्वीर ऐसी बदली कि पाठशाला को देखते ही लोग कहते हैं स्कूल हो तो ऐसा, जहां आकर ही दिल खुश हो जाए। पढ़ने का तो और ही मजा होगा। कमल किशोर ने स्कूल भवन को बच्चों के बैठन योग्य बनाया। 3 बीघा जमीन शिक्षा विभाग के नाम करवाई। इसके अलावा कई ऐसे काम किए, जिसकी बदौलत आज स्कूल का नाम पूरे प्रदेश में मशहूर है।

कमल किशोर के प्रयासों के बाद आज ऐसा दिखता है स्कूल।
कमल किशोर के प्रयासों के बाद आज ऐसा दिखता है स्कूल।

2019 में कल्होग स्कूल में पहुंचे बतौर प्रधानाचार्य

कमल किशोर बिलासपुर जिला के बरठीं क्षेत्र के रहने वाले हैं। उनकी पत्नी सावित्री शर्मा भी टीचर है, वह भी पढ़ाती हैं। लेकिन उन्हें पत्नी ने काफी सहयोग मिला। जब भी उन्हें ऐसा लगा कि दिक्कत हो रही है, वे वहां पर उनके साथ खड़ी रहीं। उन्होंने नवंबर 2019 में कल्होग में बतौर प्रधानाचार्य सेवाएं शुरू कीं। जब स्कूल पहुंचे तो भवन के नाम पर खंडहर था। हालत ऐसी थी कि प्रधानाचार्य के बैठने के लिए कमरा तक नहीं था। धीरे-धीरे करके उन्होंने स्कूल की तस्वीर बदलनी शुरू की। आज स्कूल के ज्यादातर कमरों में टाइलें लगी हैं।

3 बीघा जमीन करवाई शिक्षा विभाग के नाम

राजस्व रिकॉर्ड से पता चला कि जिस जमीन पर स्कूल भवन है, वह 15 ग्रामीणों के नाम पर है। स्कूल के नाम जमीन न होने पाने से शिक्षा विभाग भी पैसा नहीं दे पा रहा था। ऐसे में उन्होंने लोगों के बातचीत की और 3 बीघा जमीन स्कूल के नाम करवाई। इससे पहले उन्होंने निजी प्रयासों से स्कूल का कायाकल्प किया। टीचरों समेत लोगों ने पैसा इक्ट्‌ठा करके दिया। धीरे-धीरे काम चलना शुरू हुआ। खंडहर भवन को गिराकर नया भवन बनना शुरू हुआ। तब तक जमीन भी शिक्षा विभाग के नाम हो गई और 7 लाख रुपए भी मिल गए। फिर इन पैसों से 6, 7, 8, 9 और 10वीं की कक्षाओं में टाइलें लगवाईं।

स्कूल में दीवारों पर पेटिंग बनाते बच्चे।
स्कूल में दीवारों पर पेटिंग बनाते बच्चे।

जब कम पड़े पैसे तो प्रयोग किया पुराना सामान

स्कूल भवन को बेहतर बनाने के लिए पैसों की कमी आड़े आ रही थी। लेकिन कमल किशोर मन में ठान चुके थे कि उन्हें नया भवन बेहतर बनाना है। उनके दिमाग में आइडिया आया, क्यों न स्कूल भवन के पुराने सामान का प्रयोग किया जाए। फिर लकड़ी का प्रयोग हुआ, दरवाजे और खिड़कियां लगाए गए। इसके बाद पुराने भवन की टिन की चादरों का प्रयोग छत के लिए हुआ।

बिना ड्राइंग टीचर के बच्चे बनाते हैं पेंटिंग

स्कूल में वर्तमान में कोई भी ड्राईंग टीचर नहीं है, जबकि कई बच्चों की रुचि पेंटिंग में है। स्कूल में रंगरोगन का काम चला रहा था। पेंटर स्कूल में रंग रोगन कर रहे थे। प्रधानाचार्य कमल किशोर ने पेंटरों से बात की और कहा कि क्या वह उनके बच्चों को पेंटिंग सिखा सकते हैं। इस पर पेंटरों ने कहा कि उन्हें ज्यादा तो नहीं आती, लेकिन जितना आता है, वह उन्हें सिखा देंगे। बच्चों ने उनके साथ पेंटिंग बनानी शुरू की। पेंटरों ने उन्हें जानकारियां दीं और आज बच्चे खुद पेंटिंग करते हैं। इसके अलावा बच्चों द्वारा स्वयं बनाए गए विभिन्न प्रोडक्ट भी स्थानीय लोगों द्वारा सराहे जाते हैं।

टिकरिंग लैब में बनाए गए उत्पादों के साथ बच्चे और शिक्षक।
टिकरिंग लैब में बनाए गए उत्पादों के साथ बच्चे और शिक्षक।

टिंकरिंग लैब में बच्चे सीखते है इनोवेशन

कल्होग स्कूल में कई वर्ष से अटल टिंकरिंग लैब का 12 लाख रुपए का सामान धूल फांक रहा था। कमल किशोर से यह देखा नहीं गया। उन्होंने 60 हजार रुपए स्टॉफ व ग्रामीणों से एकत्रित किए और लैब के लिए एक कमरा बनाया। लॉकडाउन के दौर में कमल किशोर व उनकी टीम ने बच्चों को घर-घर जाकर पढ़ाया। अब भी वह 15 बच्चों को उनके घर जाकर पढ़ा रहे हैं। यह बच्चे बड़ोग व कल्होग के बेहद दुर्गम क्षेत्रों में रहते हैं।

2015 में मिला था राज्यस्तरीय शिक्षक अवार्ड

कमल किशोर को 2015 में राज्य स्तरीय शिक्षक अवर्ड भी मिल चुका है। उस दौरान वह उच्च विद्यालय मात्तर में मुख्याध्यापक के पद पर तैनात थे। कमल किशोर बिलासपुर के बरठीं गांव के रहने वाले हैं। 1988 में वह शिक्षा विभाग में बतौर टीजीटी शामिल हुए थे। प्रधानाचार्य बनने के बाद भी वह नियमित रूप से छात्रों को गणित की शिक्षा दे रहे हैं।

स्कूल की प्रगति देखकर शिक्षक भी प्रोत्साहित होते हैं।
स्कूल की प्रगति देखकर शिक्षक भी प्रोत्साहित होते हैं।
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