हिमाचल में एक शक्तिपीठ, जहां गिरे थे सती के पैर:चारों दिशाओं में महादेव के 4 मंदिर, 14वीं शताब्दी में खोज, मान्यता- दर्शन करने से दूर होती चिंताएं

विकास शर्मा, चिंतपूर्णी(ऊना)2 महीने पहले
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आज से चैत्र नवरात्रि 2023 शुरू हो रहे हैं। इस मौके पर हम आपको बताने जा रहे हैं, देवी मां के उस शक्तिपीठ की कहानी, जहां माता सती के पांव गिरे थे। यह शक्तिपीठ हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में सोला सिग्ही श्रेणी की पहाड़ी पर है, जिसका नाम है मां चिंतपूर्णी मंदिर, चिंतपूर्णी का अर्थ है सबकी चिंता दूर करने वाली। यह मंदिर चारों ओर से 4 शिव मंदिरों कालेश्वर महादेव, नर्हारा महादेव, मुच्कुंड महादेव और शिवबाड़ी से घिरा है।

मां चिंतपूर्णी को छिन्नमस्तिका भी कहा जाता है। छिन्नमस्तिका का अर्थ है-एक देवी जो बिना सिर के है। इस मंदिर में साल में 3 बार मेले लगते हैं। पहला चैत्र मास के नवरात्रों में, दूसरा श्रावण मास के नवरात्रों में, तीसरा अश्विन मास के नवरात्रों में। नवरात्रों में यहां श्रद्धालुओं की काफी भीड़ लगी रहती है। वैसे यह मंदिर हिमाचल आने वालों के लिए एक टूरिस्ट स्पॉट भी है। वहीं उत्तर भारत में 9 शक्तिपीठों की यात्रा में चिंतपूर्णी शक्तिपीठ के दर्शन 5वें नंबर पर होते हैं।

14वीं शताब्दी में हुई थी मंदिर की खोज
प्राचीन कथाओं के अनुसार कहा जाता है कि 14वीं शताब्दी में माई दास नामक मां दुर्गा के भक्त ने इस स्थान की खोज की थी। माई दास का जन्म अठूर गांव, रियासत पटियाला में हुआ था। माई दास के 2 बड़े भाई थे- दुर्गादास और देवीदास। माई दास का अधिकतर समय पूजा-पाठ में ही व्यतीत होता था। इसलिए वह परिवार के कार्यों में हाथ नहीं बंटा पाते थे। इससे तंग आकर भाइयों ने माई दास को परिवार से अलग कर दिया।

माई दास ने पूजा-पाठ और दुर्गा भक्ति में समय व्यतीत करना जारी रखा। एक दिन माई दास अपनी ससुराल जा रहे थे। रास्ते में एक वट वृक्ष के नीचे आराम करने बैठ गए। इसी वट वृक्ष के नीचे आज मन्दिर है। तब वहां घना जंगल था। इस जगह का नाम छपरोह था, जिसे आजकल चिंतपूर्णी कहते हैं। थकावट के कारण माई दास की आंख लग गई और स्वप्न में उन्हें दिव्य तेजस्वी कन्या के दर्शन हुए, जिसने उनसे कुछ कहा।

मंदिर में भव्य सजावट की गई है और नवरात्रि में यहां चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात रहेगी।
मंदिर में भव्य सजावट की गई है और नवरात्रि में यहां चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात रहेगी।

मां ने पहले सपने में दर्शन देकर आदेश दिए थे
कथा के अनुसार, कन्या उन्हें कह रही थी कि माई दास! इसी वट वृक्ष के नीचे बीच में मेरी पिंडी बनाकर उसकी पूजा करो। तुम्हारे सब दुख दूर होंगे। माई दास को कुछ समझ नहीं आया और वह ससुराल चले गए। ससुराल से वापस आते समय उसी स्थान पर माई दास जी के कदम फिर रुक गए। उन्हें आगे कुछ नहीं दिखाई दिया। वह फिर उसी वट वृक्ष के नीचे बैठ गए और स्तुति करने लगे। उन्होंने मन ही मन प्रार्थना की।

हे दुर्गा मां यदि मैंने सच्चे मन से आपकी उपासना की है तो दर्शन देकर मुझे आदेश दो। बार-बार स्मृति करने पर उन्हें सिंह वाहिनी दुर्गा के दर्शन हुए। देवी ने कहा कि मैं उस वट वृक्ष के नीचे चिरकाल से विराजमान हूं। लोग यवनों के आक्रमण तथा अत्याचारों के कारण मुझे भूल गए हैं। तुम मेरे परम भक्त हो। अतः यहां रहकर मेरी आराधना करो। यहां तुम्हारे वंश की रक्षा मैं करुंगी।

माई दास जी ने कहा कि मैं यहां पर रहकर कैसे आपकी आराधना करुंगा। यहां पर घने जंगल में न तो पीने योग्य पानी है और न ही रहने योग्य उपयुक्त स्थान। मां दुर्गा ने कहा कि मैं तुमको निर्भय दान देती हूं कि तुम किसी भी स्थान पर जाकर कोई भी शिला उखाड़ो वहां से जल निकल आएगा। इसी जल से तुम मेरी पूजा करना। आज इसी वट वृक्ष के नीचे मां चिंतपूर्णी का भव्य मन्दिर है और वह शिला भी मन्दिर में रखी हुई है, जिस स्थान पर जल निकला था।

वट वृक्ष भी हजारों साल पुराना, जिस पर मौली बांधकर लोग मन्नतें मांगते हैं।
वट वृक्ष भी हजारों साल पुराना, जिस पर मौली बांधकर लोग मन्नतें मांगते हैं।

मां चिंतपूर्णी को छिन्न मस्तिका भी कहा जाता
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, ऐसा विश्वास किया जाता है कि सती चंडी की सभी दुष्टों पर विजय के बाद, उनके 2 शिष्यों अजय और विजय ने सती से अपनी खून की प्यास बुझाने की प्रार्थना की थी। यह सुनकर सती चंडी ने अपना मस्तिष्क छिन्न कर लिया। इसलिए सती का नाम छिन्न मस्तिका पड़ा।

मंदिर को सरकारी ट्रस्ट के माध्यम से चलाया जाता
12 जून 1987 से इस मंदिर का प्रबंधन हिमाचल सरकार के नियंत्रण में है। इसके लिए एक ट्रस्ट की स्थापना की गई है और ज़िलाधीश ऊना इसके आयुक्त हैं। उपमंडल अधिकारी अम्ब प्रधान और सहायक आयुक्त हैं। मंदिर अधिकारी का कामकाज तहसीलदार देखते हैं।

मंदिर से दिखाई देतीं धौलाधार की पहाड़ियां
मंदिर परिसर में मां संतोषी की मूर्ति भी स्थापित है। मंदिर में प्रवेश करते ही मुख्य द्वार पर सीधे हाथ एक पत्थर दिखाई देगा। यह पत्थर वह स्थान है, जहां पर बैठकर माता ने भक्त माई दास को दर्शन दिए थे। मंदिर के साथ ही एक वट वृक्ष है, जहां पर श्रद्धालु कच्ची मौली बांधकर अपनी मनोकामना पूरी होने की मन्नत मांगते हैं। आगे पश्चिम की और बढ़ने पर बड़ का वृक्ष है, जिसके नीचे भैरव और गणेश के दर्शन होते हैं।

मंदिर के मुख्य द्वार पर सोने की परत चढ़ी हुई है। इस मुख्य द्वार का प्रयोग नवरात्रि के समय में किया जाता है। यदि मौसम साफ हो तो यहां से धौलाधर पर्वत श्रेणी देख सकते हैं। मंदिर की सीढ़ियों से उतरते वक्त उत्तर दिशा में पानी का तालाब है। पंड़ित माई दास की समाधि भी तालाब की पश्चिम दिशा की ओर है।

कैसे पहुंचें मां चिंतपूर्णी के दरबार
हवाई अड्डा- चिंतपूर्णी मंदिर के सबसे निकट हवाई अड्डा धर्मशाला के पास गग्गल में है। यह चिंतपूर्णी से लगभग 70 किलोमीटर की दूरी पर है।

रेलवे स्टेशन- चिंतपूर्णी मंदिर पहुंचने के लिए 22 किलोमीटर की दूरी पर अंब इंदौरा रेलवे स्टेशन है, जहां से वर्तमान में वंदे भारत एक्सप्रेस दिल्ली के लिए रोजाना रवाना होती है, जो शुक्रवार को नहीं चलती है। इसके अलावा हिमाचल एक्सप्रेस ट्रेन रोजाना दिल्ली से यहां आती जाती है।

सड़क सुविधा- माता चिंतपूर्णी मंदिर हिमाचल प्रदेश, पंजाब और चंडीगढ़ के सभी कस्बों से सड़कों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। चिंतपूर्णी जाने के लिए होशियारपुर, चंडीगढ़, दिल्ली, धर्मशाला, शिमला और बहुत से अन्य स्थानों से सीधी बसें मिलती हैं।