चितरंजन दास जयंती पर आयोजन:इंटक ने मनाई देशबंधु चित्तरंजन दास की जयंती, तस्वीर पर किया माल्यार्पण

चित्तरंजन25 दिन पहले
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देशबंधु चितरंजन दास की जयंती के उपलक्ष पर मौजूद लोग। - Dainik Bhaskar
देशबंधु चितरंजन दास की जयंती के उपलक्ष पर मौजूद लोग।

भास्कर न्यूज महान स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिज्ञ, कवि और वकील देशबंधु चित्तरंजन दास की शुक्रवार को 151वीं जयंती मनाई गई। इस अवसर पर इंटक ने चित्तरंजन पेट्रोल पंप के निकट चित्तरंजन दास की तस्वीर पर श्रद्धा सुमन अर्पित कर उनके योगदान को याद किया। मौके पर इंद्रजीत सिंह, संजीव साही, नेपाल चक्रवर्ती, पिंटू मिश्र, सत्यनारायण मण्डल, छोटू झा, केके मिश्रा, राजेश झा, देवाशीष मजूमदार, समेत सभी कार्यकर्ताओं ने चित्तरंजन दास को याद किया। मौके पर वक्ताओं ने कहा कि 26 जनवरी 1950 को चित्तरंजन शहर और मिहिजाम रेलवे स्टेशन का नामकरण देशबंधु चित्तरंजन दास के नाम पर चित्तरंजन रखा गया। इसी दिन चिरेका से पहले वाष्प चालित रेल इंजन का नाम भी देशबंधु रखा गया जिसे प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्र की समर्पित किया था। चित्तरंजन दास का जन्म 5 नवंबर 1870 को पश्चिम बंगाल में हुआ था। एक वकील के रूप में, दास ने उन भारतीयों का बचाव किया जिन पर राजनीतिक अपराधों का आरोप लगाया गया था। दास का राजनीतिक करियर सिर्फ छह साल का रहा, लेकिन इतने कम समय में भी वह अपनी छाप छोड़ने में सफल रहे। वक्ताओं ने कहा कि वे स्वदेशी विचार में विश्वास रखते थे और पश्चिमी शक्तियों द्वारा प्रचारित विकास की धारणा को पूरी तरह से खारिज कर दिया था। कलकत्ता अधिवेशन में उन्होंने गाँव के पुनर्निर्माण की एक योजना सामने रखी, जिसमें स्थानीय स्वशासन, सहकारी साख समितियों की स्थापना और कुटीर उद्योग को फिर से शुरू करने जैसे कदम शामिल थे। उन्होंने महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले असहयोग आंदोलन में भाग लिया। आंदोलन के दौरान, उन्होंने बंगाल में ब्रिटिश कपड़ों पर प्रतिबंध लगाने की भी पहल की। 1921 में आंदोलन में भाग लेने के लिए दास को उनकी पत्नी बसंती देवी और बेटे के साथ छह महीने के लिए जेल में डाल दिया गया था। वक्ताओं ने कहा कि 55 वर्ष की उम्र में 16 जून 1925 को दार्जिलिंग में दास की मृत्यु हो गई। देश के लिए उनके त्याग के चलते लोगों औऱ गांधी जी ने उन्हें देशबंधु कहना शुरू कर दिया था।

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