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कमाई:प्रकृति संवार रही आदिवासियों का जीवन, दोना-पत्तल बना रही

जामताड़ा6 दिन पहले
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  • 40 से 50 रु. प्रति सैकड़े की दर से बेचतीं है जंगल निर्मित सामान, होती है कमाई

लॉकडाउन से पूरा देश आर्थिक मंदी से जूझ रहा है। समाज के सभी वर्गों पर खासा प्रभाव पड़ा है, लोगों के रोजगार खत्म हो रहे हैं। वहीं, जामताड़ा के आदिवासी समाज लॉकडाउन के दौरान भी पलाश के पत्तों से दोना-पत्तल और कटोरी बनाकर अपना रोजगार कर रहे हैं।दोना-पत्तल का काफी प्रचलन है। धार्मिक रीति-रिवाज के साथ-साथ रोजमर्रा के जिंदगी में भी दोना-पत्तलों का उपयोग यहां खूब होता है। आदिवासी समाज के लोग इस कारोबार से जुड़े हैं। जामताड़ा के नारायणपुर प्रखंड अंतर्गत सावलापुर आदिवासी टोला गांव, जहां आदिवासी समाज के लोग पलाश के पत्तों से कटोरी और थाली तैयार करते हैं। जिसका उपयोग वे सिर्फ अपने घरेलू कामों में ही नहीं, बल्कि आस-पड़ोस के जिलों में शादी-विवाह के मौके पर आर्डर के अनुसार देते हैं।

इसके साथ-साथ आदिवासी समाज के लोग पास के बाजारों में दोना-पत्तल बेचते हैं, जिससे उनकी आमदनी भी होती है। इस काम में आदिवासी परिवार के महिलाएं-पुरूष के साथ-साथ बच्चे भी शामिल होते हैं। खासकर आदिवासी महिलाएं इस काम में ज्यादा लगी है। झारखंड की गोद में प्रकृति की हरियाली, पलाश फूल की लालिमा आसानी से देखने को मिल जाती है। संथाल परगना के जंगली क्षेत्रों में पलाश का पेड़ बहुतायत मात्रा में पाया जाता है। पलाश के पत्तों के लिए यहां के लोगों को ज्यादा भटकना नहीं पड़ता है। स्थानीय लोग हैं कि दोना-पत्तल को वह सिर्फ बेचते ही नहीं हैं, बल्कि अपनी रोजमर्रा के जिंदगी में भी इसको उपयोग करते हैं। वे अपने घरों में खाने-पीने के लिए पलाश के पत्तों का उपयोग करते हैं।

इसके उपयोग से वातावरण को भी कोई नुकसान नहीं पहुंचता है। इससे उनलोगों को अच्छी खासी कमाई भी हो रही है। दोना-पत्तल के कारोबार से जुड़े लोग बताते हैं कि 40-50 रुपए प्रति सैकड़ा के हिसाब से दोना-पत्तल को बेचते हैं। पलाश पेड़ के पत्ते और फूल से लेकर इसके डाल तक आदिवासी संस्कृति में काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। अब इसके पत्ते से कटोरी, थाली तैयार कर आदिवासी समाज आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो रहा है। जरूरत है सरकार को इस ओर ध्यान देने की, ताकि इससे आदिवासी समाज का आर्थिक संवर्धन के साथ-साथ उन्हें रोजगार भी उपलब्ध हो सके।

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