सोहराय पर्व:किसी ने चूहा ताे किसी ने किया बटेर का किया शिकार,सोहराय के पांच दिवसीय पर्व के अंतिम दिन सेंदरा को लेकर उत्साहित दिखे आदिवासी युवा

जामताड़ा7 दिन पहले
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आदिवासी समुदाय का पांच दिवसीय महापर्व सोहराय मकर संक्रांति के दिन समापन हो गया। यह महापर्व प्रकृति के प्रेम के साथ-साथ भाई बहन का प्रेम का प्रतीक त्योहार है। पांच दिवसीय पर्व के दौरान विभिन्न कार्यक्रम का आयोजन कर हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। सकरात के दिन सूरज उगने के पहले समुदाय के लोग स्नान आदि कर तरह-तरह के पकवान भोजन कर पुरुष लोग शिकार करने के लिए वन जंगल गए। इस दौरान किसी ने चूहा, किसी ने बटेर, किसी ने खरगोश तो किसी ने कबूतर का किया शिकार।

प्रधान समाय पावरिया ,पाराणिक भूतनाथ मुर्मू ने बताया की पांच दिवसीय आदिवासियों का सोहराय पर्व महापर्व है ,जहां आपस में हम लोग मिलजुलकर यह पर्व मनाते हैं. मकर संक्रांति के दिन सूरज उगने के पहले स्नान आदि कर मरांगबुरू, गौशाय ईरा, जोहार ईरा आदि देवी-देवताओं का पूजा अर्चना की ग्ई। लोगों ने विभिन्न प्रकार के पकवान बनाकर भोजन कर वन जंगल के और शिकार करने जाते हैं इस दौरान जो भी प्राप्त होता है आपस में हम पुरुष मिलकर भाग बटवरा कर के भोजन करते हैं। पर्व के पांचों दिन गिला शिकवा भूलकर बच्चे, जवान, बुजुर्ग आपस में मिलकर मांदर की थाप पर झूमे गाए। नाला में आदिवासी समाज का प्रमुख बंदना-सोहराय पर्व शुक्रवार को खुशी और भाईचारे के साथ संपन्न हुआ।

इस पर्व के दौरान पारंपरिक नृत्य-संगीत, मांदर-नगाड़े की मधुर धुन और लजीज खानपान से संपूर्ण क्षेत्र में लगभग एक सप्ताह तक खुशी व उत्साह का माहौल बना रहा। त्योहार के अंतिम दिन सांकरात अनुष्ठान के तहत समाज के लोग सेंदरा यानी शिकार के लिए गांव से बाहर निकले। परंपरागत तरीके एवं तीर धनुष के साथ छोटे बड़े अलग अलग समूह में शिकार करने की प्रथा को वीरता का प्रतीक माना जाता है।

बड़े-बुजुर्गाें ने भी निभाई शिकार की परंपरा
पबिया में आदिवासी समाज के बड़े बूढ़े सभी साथ शिकार खेलने को निकलते हैं। पारंपरिक हथियार लेकर शिकार करने का यंत्र तीर धनुष, भाला ,फरसा, कुल्हाड़ी, गेंता, कुदाली लेकर अपने लक्ष्य की और सभी साथ बढ़ते हैं। कहीं चूहा तो कहीं बरेट कहीं पक्षी का शिकार कर अपना मनोरंजन भी किया। सभी अलग-अलग टोली में निकल कर अपना शिकार पाने के लिए जी जान लगाकर प्रयास करते रहे। छोटे बच्चे युवा बुजुर्ग सभी अलग-अलग टोली में निकले और खेत के मेड़ में चूहा, पेड़ों में पंछी की तलाश दिन भर जारी रखा।

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