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भास्कर की पड़ताल:जमीन के पेंच में फंसी हैं बीसीसीएल की 10 खदानें, विवाद सुलझे ताे सालाना 5.15 मिलियन टन अधिक काेयला मिलेगा

धनबाद3 महीने पहलेलेखक: संजय मिश्रा
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एकीकृत मुराइडीह परियोजना, यहां कोयला खनन का काम चल रहा है, लेकिन जमीन विवाद के कारण इसका विस्तारीकरण रुक गया है। - Dainik Bhaskar
एकीकृत मुराइडीह परियोजना, यहां कोयला खनन का काम चल रहा है, लेकिन जमीन विवाद के कारण इसका विस्तारीकरण रुक गया है।
  • देशभर में कोयले की किल्लत और इससे उपजे बिजली संकट के बीच बीसीसीएल की कोयला खदानों पर भास्कर की पड़ताल

देशभर में काेयले की किल्लत है। मांग अचानक बढ़ गई है। काेयले की कमी के कारण बिजली संकट पैदा हाे रहा है। वहीं झारखंड में बीसीसीएल की 10 खदानें जमीन विवाद की वजह से बंद पड़ी हैं। यह संख्या कुल चालू खदानाें की एक तिहाई है। यहां वर्षाें से विवाद जारी है और यह बीसीसीएल के काेयला उत्पादन व डिस्पैच के लक्ष्य काे हासिल करने में बाधक बना है। जानकार बताते हैं कि अगर विवाद सुलझाकर इन खदानाें से काेयला उत्पादन शुरू कर दिया जाए, ताे इनसे सालाना करीब 5.15 मिलियन टन काेयला मिल सकता है।

यह पावर प्लांटाें में काेयले की बढ़ी हुई मांगें पूरी करने में महत्वपूर्ण साबित हाे सकता है। बीसीसीएल की तमाम खदानें 12 एरिया में बंटी हुई है। इनमें एरिया-वन और ब्लाॅक-टू में सबसे ज्यादा विवाद है। एरिया-वन की फुलारीटांड़ काेलियरी और ब्लाॅक-टू की केसरगढ़ काेलियरी का विवाद 20 साल से भी अधिक पुराना है।

इसके साथ ही चांच विक्टाेरिया एरिया की दहीबाड़ी और जामागाेड़िया परियाेजनाओं में भी जमीन विवाद के कारण खनन नहीं हाे पा रहा है। ज्यादातर विवाद जमीन अधिग्रहण और अतिक्रमण से जुड़े हैं। रैयत और अतिक्रमणकारी आए दिन मुआवजे और नाैकरी की मांग के साथ धरना-प्रदर्शन करते रहते हैं। कंपनी प्रबंधन उनसे बातचीत भी करती है। आधिकारी आते हैं। समझाते हैं लेकिन विवाद नहीं सुलझ पा रहा है।

कुछ परियोजनाओं में विवाद, समाधान की कोशिश
कुछ परियाेजनाओं में विवाद है। समाधान निकालने की काेशिश की जा रही है। कई जगहाें पर प्रगति है। अभी प्रतिदिन 95 हजार टन उत्पादन हाे रहा है। उत्पादन और डिस्पैच बढ़ रहा है। -पीएम प्रसाद, सीएमडी, बीसीसीएल

एक्सपर्ट व्यू : राकेश कुमार, पूर्व तकनीकी निदेशक, बीसीसीएल

​​​​​​​5 साल की जगह सालभर के क्लियरेंस में शुरू कर देते हैं खनन, इसीलिए विवाद
काेई भी काेयला खनन परियाेजना लंबे समय तक चलती है। कम से कम पांच साल खनन के लिए परियाेजना में जमीन क्लियरेंस हाेनी चाहिए। जमीन चाहे सरकारी हाे, वन विभाग की हाे या फिर रैयती, अधिग्रहण में समय लगता है। लेकिन, सरकारें और काेयला कंपनियां जल्दी खनन शुरू करने के लिए पर्याप्त जमीन अधिग्रहण किए बगैर काम शुरू करा देती हैं।

इससे कुछ महीनाें तक उत्पादन सुचारू रहता है। लेकिन, खनन का दायरा बढ़ने के साथ ही समस्याएं आने लगती हैं, क्याेंकि उसके लिए जमीन क्लियर ही नहीं हाेती। जरूरत है माइंडसेट काे बदलने की। जमीन अधिग्रहण पाॅलिसी में बदलाव लाना हाेगा। लैंड एंड रेवेन्यू डिपार्टमेंट काे मजबूत बनाना हाेगा। रैयताें और अतिक्रमणकारियाें के साथ लगातार बातचीत कर समस्या काे सुलझाने की काेशिश करनी हाेगी।

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