मकर संक्रांति:बिहारी कल मनाएंगे संक्रांति, टुसू पर आदिवासियों का उत्सव आज, चारदिनी पोंगल की होगी शुरुआत

धनबाद8 दिन पहले
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  • देश के अलग-अलग राज्यों में कई नाम से जाना जाता है यह त्योहार, स्नान करके करें दान-पुण्य

भगवान भास्कर शुक्रवार से उत्तरायण हाे रहे है। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर ही मकर संक्रांति का त्याेहार मनाया जाता है। देश के अलग-अलग राज्याें में इस त्याेहार काे अलग-अलग नाम से मनाया जाता है। पंचांग के अनुसार इस बार मकर संक्रांति का त्याेहार शुक्रवार और शनिवार काे भी मनाया जाएगा। बिहारी समुदाय के लाेग जहां मकर संक्रांति काे खिचड़ी के नाम से भी मनाते है, वहीं तमिल और तेलगु समाज के लाेग इस पर्व काे पाेंगल के रूप में मनाते है।

मारवाड़ी समाज, गुजराती समाज में भी इस त्याेहार का अलग महत्व है। सिख समाज मकर संक्रांति के एक दिन पूर्व ही लाेहरी का त्याेहार मनाते है। सभी समाज के लाेग इस त्याेहार काे अपनी संस्कृति के अनुसार मनाते है। इस साल काेराेना के कारण सार्वजनिक रूप से काेई भी कार्यक्रम आयाेजित नहीं किया जाएगा।

घराें में घुलेगी तिल-गुड़ की मिठास
मकर संक्रांति के दिन गुजराती परिवारों में उंधियू बनाने की परंपरा है। उंधियू मिक्स वेजिटेबल टाइप की सब्जी है। जिसमें सभी प्रकार के सिजनल सब्जी का प्रयोग होता है। इसे अधिकतर तिल के तेल में बनाया जाता है और लोग जलेबी के साथ इस का लुफ्त उठाते है। उस दिन पूजा-पाठ करने के बाद परिवार के सभी सदस्य तिल-गुड़ खाते है। समाज में मकर संक्रांति के दिन पतंग उड़ाने की परंपरा है। मान्यता है कि इस दिन पतंग उड़ाने और दूसरे की पतंग काटने से दुश्मनी का नाश हाेता है।

तमिल और तेलगु समाज के लाेग 4 दिन तक मनाते हैं पोंगल उत्सव
तमिल और तेलगु समाज के लाेग इस त्याेहार काे पाेंगल के रूप में मनाते है। यह उत्सव चार दिनाें तक चलता है। पहले दिनबाेगी पाेंगल, दूसरे दिन सूर्या पाेंगल, तीसरे दिन मट्ट पाेंगल और चाैथे दिन कनूमा पाेंगल मनाया जाता है। इस समाज के लाेग भी पहले पूजा-अर्चना करते है। चाराें दिन यह क्रम चलता है। पाेंगल के पहले दिन घर के सभी सदस्य सूर्याेदय से पहले उठ कर स्नानादि करते है और उसके बाद हाेली जलाते है। शाम में बच्चाें पर फूल न्याेछावर करने की भी परंपरा है।

संक्रांति पर यूपी-बिहारी में नवविवाहिता काे नए कपड़े भेजने की है परंपरा
बिहारी समाज में इस त्याेहार का विशेष महत्व है। बिहार और यूपी में इस त्याेहार काे खिचड़ी के रूप में भी मनाया जाता है। मकर संक्रांति के दिन सूर्याेदय के पूर्व स्नान की परंपरा है। घर के सभी सदस्य स्नान करने के बाद चूड़ा, तिल, गुड़, तिलकुट के साथ-साथ चावन, दाल, आटा, आलू, और नगद पैसा दान करते है। दान के बाद चूड़ा-दही, तिल-गुड़ खाते है। बहुत घराें में उसी दिन शाम में खिचड़ी बनता है और रात में घर के लाेग खिचड़ी खाते है। नवविवाहिता काे नया कपड़ा भी भेजा जाता है।

मारवाड़ी समाज में बनाई जाती है पकौड़ी
मारवाड़ी समाज में भी मकर संक्रांति का त्याेहार उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस समाज में भी पूजा पाठ और दान देने की परंपरा है। संक्रांति के एक दिन पूर्व से ही त्याेहार शुरू हाे जाता है। घराें में दाल की पकाैड़ी और पुए बनाया जाता है। 14 सुहागिनाें काे सुहाग से जुड़ी 14 चीजे दान स्वरूप देने की परंपरा है।

मराठियों में दान की है परंपरा
महाराष्ट्र के रहने वाले लाेग भी इस त्याेहार काे बड़े उत्साह से मनाते है। मराठी समाज में यह पर्व हल्दी-कुमकुम के नाम से जाना जाता है। समाज की महिलाएं हल्दी और कुमकुम लेकर दूसरे के घर जाती है और तिलक लगाकर गुड़ और तिल का लड्डू एक-दूसरे काे देती है। सभी एक-दूसरे काे पर्व की बधाई देती है। इस समाज में भी दान की परंपरा है। हर लाेग अपने-अपने पुराेहित काे दान देते है।

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