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महत्व:जयंती धारण से बढ़ता है यश, नीलकंठ के दर्शन से हाे जाता है पाप का नाश, विजयादशमी पर जयंती धारण व नीलकंठ पक्षी के दर्शन का विशेष महत्व

धनबादएक महीने पहले
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नवरात्र पर माता दुर्गा 9 स्वरूपाें में भक्ताें काे दर्शन देती हैं। नाैवें दिन सिद्धिधात्रि स्वरूपा माता दुर्गा की आराधना हाेती है, जाे 9 सिद्धियाें काे प्रदान करनेवाली हैं। मान्यता है कि नवरात्र व्रत के बाद माता दुर्गा ने प्रसन्न हाेकर भगवान राम काे लंका विजय का आशीर्वाद दिया था। अगले ही दिन भगवान राम ने दशमी काे रावण का वध किया था। ज्याेतिषाचार्य पंडित रमेश चंद्र त्रिपाठी का कहना है कि विजयादशमी पर माता दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन से पहले चूड़ा-दही का भाेग, जयंती धारण करना और नीलकंठ पक्षी के दर्शन का विशेष महत्व है।

जयंती धारण : माता दुर्गा इस स्वरूप में अपने भक्ताें काे विजयी प्रदायनी हैं

पंडित सुधीर पाठक कहते हैं कि कलश स्वरूप में माता दुर्गा निराकार स्वरूपा हैं। बालू के साथ जै काे मिलाकर उस पर कलश स्थापित कर नाै दिनाें तक निराकार स्वरूप में माता दुर्गा की अाराधना की जाती है। कलश स्थापना में निकलने वाली जयंती माता दुर्गा की विजया स्वरूप है। विजयादशमी पर जयंती धारण करने से माता दुर्गा भक्ताें काे यश, कृति, लाभ, सुख-समृद्धि और विजय का आशीर्वाद प्राप्त हाेता है।

नीलकंठ दर्शन : भगवान शिव हर लेते हैं सारे पाप

रमेश चंद्र त्रिपाठी का कहना है कि रावण वध के बाद श्रीराम काे जब ब्रह्महत्या का पाप लगा, ताे उन्हाेंने पश्चाताप के लिए भगवान शिव की आराधना की। तब शिवजी ने नीलकंठ पक्षी के रूप में दर्शन देकर उनके सारे पापाें काे नाश किया था। विजयादशमी पर नीलकंठ पक्षी का दर्शन कर पूरा साल शुभ रहता है। किसान इसे उन्नत कृषि से इसे जाेड़कर देखते हैं।

चूड़ा-दही का भाेग: ताकि मां को यात्रा में न हो कष्ट

विजयादशमी पर माता दुर्गा काे चूड़ा-दही का भाेग अर्पित कर विदा करना शुभ माना गया है। पंडिताें का कहना है कि बेटी की विदाई के समय सिंदूर लगाकर खाेइंचा भरा जाता है, दही आदि खिलाया जाता है। मां दुर्गा काे भी सिंदूर लगाकर, खाेइंचा भरने के बाद दही-चूड़ा का भाेग अर्पित कर विदाई दी जाती है। इससे यात्रा में माता दुर्गा काे किसी तरह का विघ्न नहीं आता।

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