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  • Worship Of Mother Adi Shakti Was First Started In Jharia By The Royal Family, After The Death Of King Kali Prasad, Worship Of Mandira Was Given To The Hands Of The Temple Committee.

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मां आदि शक्ति की पूजा:झरिया में मां आदि शक्ति की पूजा सर्वप्रथम राजपरिवार ने शुरू कराई, राजा काली प्रसाद के निधन के बाद मंदिराें की पूजा व्यवस्था मंदिर कमेटी के हाथाें दे दी गई

धनबादएक महीने पहले
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काले हीरे के नाम से प्रसिद्ध झरिया काेयलांचल आस्था के लिए भी जाना जाता रहा है। यहां पर जब-जब मां आद्य शक्ति की आराधना की बात हाेगी। तब-तब झरिया राज परिवार याद किए जाएंगे। हम बात कर रहे हैं झरिया काेयलांचल में हाेने वाली दुर्गा पूजा की।

झरिया में मां आद्य शक्ति की पूजा सर्वप्रथम राजपरिवार ने ही शुरू कराई थी, जाे धीरे-धीरे भव्य रूप ले लिया। झरिया के पुराना राजागढ़ के अलावा आमलापाड़ा दुर्गा मंदिर, पाेद्दारपाड़ा मुखर्जी मंदिर, मिश्रापाड़ा आदि स्थानाें में हाेने वाली पूजा में राजपरिवार की अहम भूमिका है। 1971 तक उक्त सभी स्थानाें पर राजपरिवार के सहयाेग से पूजा-अर्चना हाेती रही, परंतु राजा काली प्रसाद के निधन के बाद उक्त मंदिराें की पूजा की व्यवस्था मंदिर कमेटी के हाथाें दे दी गई।

राज परिवार आज भी करता है कुलदेवी की पूजा
पुराना राजागढ़ स्थित मिट्टी से बने सिरा घर झरिया राजपरिवार के लिए आस्था का केंद्र है। यहां पर राजपरिवार के सदस्याें काे छाेड़कर अन्य किसी काे सिराघर मेंं प्रवेश करने की इजाजत नहीं है। लाेगाें का कहना है कि सिरा घर में राजपरिवार के अस्त्र-शस्त्र के अलावा कई ऐसी चीजे हैं। इसके कारण उक्त घर मेंं सिर्फ राजपरिवार के लाेग पूजा-अर्चना करते हैं। इधर, झरिया के प्राचीन मंदिराें में मां आद्य शक्ति का आह्वान मां के रूप मेंं की जाती है। चार दिनाें तक पूजा-अर्चना के बाद दशमी के दिन महिला मां की विदाई बेटी के रूप में खाेइछा भर और सिंदूर लगाकर करती हैं। यहां पर सर्वप्रथम राजागढ़ दुर्गा मंदिर मेंं मां की प्रतिमा विसर्जित किया जाता है। इसके बाद अन्य मंदिर से मां की प्रतिमा कंधे पर विसर्जित किया जाता है।

डाेमगढ़ के तानाशाह राजा से दिलाई थी मुक्ति: पंडित दयामय
झरिया आमला दुर्गा मंदिर के पुजारी दयामय बनर्जी का कहना है कि एमपी के रिवा से 1593 में बृज भूषण प्रसाद सिंह शिकार खेलते-खेलते झरिया पहुंचे। यहां उनकी मुलाकात पंडित मानिक मुखर्जी से हुई।

मुखर्जी ने बृज भूषण प्रसाद से आग्रह किया कि डाेमगढ़ के तानाशाह राजा से झरियावासियाें काे मुक्ति दिलाए। इसके बाद राजा बृज भूषण ने अपने पुत्र रास बिहारी काे डाेमगढ़ के राजा से युद्ध करने की बात कही थी। रास बिहारी ने जब डाेमगढ़ राजा का वध कर विजय हासिल करने पर रास बिहारी काे राज तिलक कर झरिया का राजा घाेषित किया गया। युद्ध में प्रयाेग किए गए सभी अस्त्र-शस्त्र पुराना राजागढ़ स्थित सिरा घर में रख मिट्टी डाल दी गई। यहां पर राजपरिवार कुलदेवी की पूजा-अर्चना करते हैं।

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