धर्म-कर्म:माताओं ने उपवास रख संतान की दीर्घायु होने की कामना की

चौपारण19 दिन पहले
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चौप प्रखण्ड सहित पूरे देश मे महिलाओ ने जीवित्पुत्रिका व्रत कर संतान की मंगलकामना व दीर्घायु होने की कामना रविवार को निर्जला जीतिया व्रत रख कर की। इस अवसर पर व्रती महिलाओं ने चिल्हो, सियारिन व पितर-पितराइन व जितमाहन बाबा को अपने कुल की परंपरा के अनुसार नैवेद्य अर्पित कर कथा भी सुनी। इससे पहले मिट्टी तथा गाय के गोबर से चील व सियारिन की प्रतिमा बनाई गई। साथ ही जीवितवाहन की कुशा से निर्मित प्रतिमा को धूप-दीप, अक्षत पुष्प आदि अर्पित कर विधिवत पूजा-अर्चना की गई। पंडितों से जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा सुनने के बाद जीवितवाहन भगवान की प्रतिमा की बनी माला को गले में धारण किया और संतान की सलामती की दुआ मांगी।

कई महिलाओं ने तो संतान की संख्या के आधार पर जीवितवाहन भगवान की प्रतिमा को धागे में पिरोकर धारण किया। इस दौरान महिलाओं ने पारंपरिक गीत भी गाई। वहीं अगले दिन 30 से 32 घण्टे तक अखंड निर्जला उपवास रहकर सोमवार की सुबह वर्ती पारण करेंगी। व्रत करने वालो में रेणु देवी, देवंती कुमारी, गीता देवी, शकुंतला देवी, संगीता देवी, रेणु कुमारी, पूनम देवी, चमेली देवी, मनोरमा देवी सहित कई महिलाएं शामिल थी।

200 रुपए किलो बिका नोनी का साग

जीवित पुत्रिका या जितिया व्रत पर नूनी का साग 200 रुपए किलो बिका। जितिया व्रत पर माताएं अपनी संतान के स्वस्थ जीवन और लंबी आयु की कामना के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। उपवास के बाद चुनी हुई सब्जी, साग खाने की परंपरा रही है। पोई और नूनी साग का सांस्कृतिक महत्व रहा है। उपवास के बाद इसका सेवन व्रत करने वाली माता के साथ-साथ संतान भी करते हैं। साग एक दिन पहले ही बाजार में उपलब्ध हो जाता है।

पानी वाले दलदली मिट्टी में उगने वाला यह साग जितिया पर्व के एक दिन पहले सब्जी की दुकान में विशेष ढंग से साफ सुथरा कर रखा जाता है। साग के साथ मडुआ की रोटी भी इस दिन खाने की परंपरा चली आ रही है। मडुआ का पौष्टिक महत्व भी है। भोजन की संस्कृति और पौष्टिकता में अपनी महत्ता के कारण ही मडुआ जिसे रागी के नाम से जानते हैं,

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