महिला शक्ति को नमन:पद्मश्री डॉ. तुलसी मुंडा 1100 विद्यार्थियों का संवार रहीं भविष्य

चाईबासा/बड़बिल9 महीने पहले
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तत्कालीन राष्ट्रपति से सम्मान लेतीं डाॅ. मुंडा। - Dainik Bhaskar
तत्कालीन राष्ट्रपति से सम्मान लेतीं डाॅ. मुंडा।
  • गांधीवादी विचारधारा की तुलसी मुंडा का बालश्रमिक से शिक्षा व समाजसेवा के क्षेत्र में बेहतर योगदान
  • आदिवासी विकास समिति विद्यालय की स्थापना की

विश्व महिला दिवस महिलाओं की संघर्ष और अधिकारों के लिए मनाया जाता है। इस अवसर पर हम सब शपथ लें कि समाज से असुरक्षित वातावरण समाप्त कर सुरक्षित भविष्य का निर्माण करेंगे। महिलाओं को अधिकार देने के साथ-साथ संगठित कर समग्र मानव समाज को आगे बढ़ाएंगे।

ब्रिटिश शासन के समय अभिभाजित केंदूझर राज्य और स्वतंत्र भारत के ओडिशा राज्य का आदिवासी बहुल क्षेत्र केंदूझर जिला कईंश गांव के गोपालसाही में जन्मी तुलसी मुंडा, पिता चरण मुंडा और माता घस मुंडा की 5 बेटियों और 2 बेटों में तुलसी सबसे छोटी थी। इनकी जन्मतिथि सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक 15 जुलाई 1947 है। चरण मुंडा ब्रिटिश और आजाद भारत में पड़ोस गांव सुनारीपोषी का चउकीया (सरकारी प्रतिनिधि) थे। पद्मश्री डॉ. तुलसी मुंडा शिक्षा और समाजसेवा क्षेत्र में प्रेरणा के श्रोत हैं।

1982 में तुलसी मुंडा ने भद्रासही स्थित समाजसेवा केंद्र को आदिवासी विकास समिति विद्यालय की स्थापना कर अब तक बीस हजार से ज्यादा बच्चों को शिक्षा देने में सफल हुई है। अब इस आवासीय विद्यालय में प्रथम कक्षा से दसवीं तक करीब 1100 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। 2017 में उनके जीवन पर आधारित ओडिया चलचित्र “तुलसी अपा” कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी हैं। ओडिशा सिनेमा के लेखक, निदेशक और प्रड्यूसर अमिय पट्टनायक ओडिशा का पहला बायोपिक बनाए थे।

डॉ. तुलसी को सम्मानित करते अभिताभ।
डॉ. तुलसी को सम्मानित करते अभिताभ।

तुलसी मुंडा की तबीयत बिगड़ी, अस्पताल में चल रहा इलाज

7 मार्च को उनकी तबीयत खराब हो गई, जिसके बाद अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है। बता दें कि इससे पहले वह पीछले महीने 16 फरवरी को बीमार हुई थी, जिसके बाद उन्हें भुवनेश्वर के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वह स्थस्थ होकर घर लौटी और अपने सामाजिक कार्यों में जुट गई।

शिक्षा : सामाजिक व्यवस्था के अनुसार प्राथमिक शिक्षा चाटसाली में दी जाती थी। लड़कियों की शिक्षा के लिए सामाजिक परिस्थितियां अनुकूल नहीं थीं। तुलसी के मौसेरे भाई कुसनु मुंडा चाटसाली में पढ़ कर घर लौटने के बाद तुलसी को जमीन पर लकीर खींच कर पढ़ाते थे। तुलसी की स्मरण शक्ति बहुत अच्छी थी।

बालश्रम : परिवार को आर्थिक सहयोग करने लिए दस साल की छोटी सी उम्र में खदानों में पत्थर तोड़ने बड़बिल आ गई। बड़बिल का सेरेंडा गांव में जीजा भद्र ओराम और दीदी जंगी मुंडा के साथ रहने लगी। जीजा किसी खदान में माइनिंग मेट के रूप में कार्यरत थे। तुलसी को 25 पैसे प्रतिदिन मजदूरी मिलती थी।

समाजसेवा : कईंश गांव के पास कांटीआपढ़ा का कस्तूरबा ट्रस्ट कर्मी सच्चीबाला पंडा से मुलाकात हुई। पढ़ाई करते हुए समाजसेवी सच्चीबाला पंडा से प्रभावित होकर कस्तूरबा ट्रस्ट में स्वेच्छासेवी के रूप में योगदान दी। सच्चीबाला पंडा के निर्देश पर आदिवासी और हरिजन श्रेणी के पिछड़े लोगों की संस्था उत्कल नवजीवन मंडल अनुगुल में दो साल का प्रशिक्षण प्राप्त की। संस्था के संस्थापक सदस्य व कोषाध्यक्ष मालती देवी चौधरी के सानिध्य में प्रशिक्षण पूरा की। इस दौरान भारत के कई स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारकों से मिलने का मौका मिला था। स्वतंत्रता सेनानी और ओडिशा के द्वितीय मुख्यमंत्री नवकृष्ण चौधरी और आचार्य विनोबा भावे से प्रशिक्षण प्राप्त की।

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