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दुर्गोत्सव:1857 में अंग्रेजों के बाद इस बार कोरोना को लेकर प्रशासन ने विसर्जन मार्ग में किया बदलाव, पर पुराने रूट से गए श्रद्धालु

चक्रधरपुरएक महीने पहले
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  • जय दुर्गे-जय दुर्गे के जयकारों के साथ चक्रधरपुर में पूजा समितियों ने किया मां की प्रतिमा का विसर्जन

कोरोना संक्रमण के मद्देनजर पश्चिम सिंहभूम जिला प्रशासन ने चक्रधरपुर में 1857 से चली आ रही दुर्गा पूजा के प्रतिमा विसर्जन मार्ग में बदलाव कर दिया, लेकिन श्रद्धालुओं ने प्रशासन की एक न सुनाई और पुरानी परंपरा का निर्वहन किया। ऐसी ही कोशिश 1857 में अंग्रेजों ने की थी। उस समय भी यहां की जनता ने विशाल जुलूस निकाल कर अंग्रेजों को जवाब दिया था। इस बार कोरोना के कारण प्रशासन ने पवन चौक में मार्ग में बदलाव किया था। इसके पालन के लिए प्रशासनिक टीम पवन चौक के पास अपील करती रही, लेकिन श्रद्धालुओं ने उनकी एक न सुनी। कोविड-19 के सभी नियमों को भूलते हुए हजारों की संख्या में लोग विसर्जन जुलूस के गवाह बने। इस जनसैलाब को देख प्रशासन भी नतमस्तक हो गया।

इसके बाद चक्रधरपुर के बाकी पूजा पंडालों की प्रतिमाएं भी बाटा रोड, पुरानी रांची रोड होते हुए शहीद भगत सिंह चौक पहुंचीं और संजय नदी में विसर्जन किया। चक्रधरपुर की प्रतिमा विसर्जन की खास बात यह है कि यहां की सबसे पुरानी आदि पूजा समिति (पुरानी बस्ती) की प्रतिमा को राजघराने के समय से ही कंधों पर उठाकर विसर्जन के लिए नदी घाट तक ले जाया जाता है। रोशनी के लिए प्रतिमा के आगे और पीछे सैकड़ों मशालें जलती थी। उसी परंपरा का आज भी निर्वाह होता है। हालांकि इस बार मशालों की संख्या कम रही। पिछले साल तक जहां 300 से 400 मशालें जलती थीं, वहां इस बार सिर्फ 11 मशाल जलाई गई। इस कारण रोशनी की कमी हुई और प्रतिमा ढोने वाले भक्तों को परेशानी हुई। कोरोना के कारण इस वर्ष सीरियल नंबर सिस्टम से प्रतिमा का विसर्जन नहीं हुए। जैसे-जैसे पूजा समितियां प्रतिमा लेकर पवन चौक पहुंचती गईं, उन्हें बाटा राड, पुरानी रांची रोड होते हुए विसर्जन के लिए रवाना किया गया। श्रद्धालुओं ने सिंह बाजा और ढोल की धुन पर झूमते हुए मां को विदाई दी। रात 10 बजे तक 21 समितियों ने विसर्जन किया।

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