भास्कर विशेष:किसान और पशुओं के बीच प्रेम काे दर्शाता है सोहराय

मुसाबनीएक महीने पहले
  • कॉपी लिंक
  • आदिवासी संस्कृति से जुड़ा सोहराय पर्व शुरू, पशुधन की आरती उतारकर की गई पूजा-अर्चना

दीपावली खत्म होते ही आदिवासियों का सोहराय शुरू हो गया। किसान और पशुओं के बीच अगाध प्रेम को सोहराय दर्शाता है। इस दौरान गोट पूजा की जाती है। आदिवासी श्रद्धा के साथ पशुओं को भगवान मानकर पूजा पाठ करते हैं। ग्रामीण क्षेत्र में आदिवासी संथाल समाज की ओर से साल के अंत में सोहराय पर्व को लेकर विशेष तैयारी की जाती है। मिट्टी के घरों को आकर्षक रंगों से सजाया संवारा जाता है। ग्रामीण अपने-अपने तरीके से घरों को एक आकर्षण रूप देते हैं। गांव में साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है।

पहले दिन हुई गोट पूजा, बैल के सिंग में लगाया गया तेल

तीन दिन के इस सोहराय पर्व में गोट पूजा के बाद दूसरे गांव में सभी अपने-अपने पशुओं की पूजा करते हैं। बैल के सिंग और पैर में तेल लगाया जाता है। बैल की आरती उतारी जाती है और बैल की सेवा की जाती है। तीसरे दिन गांव मे गोरू खुटान होता है। इसमें बैल को एक खूंटे मे बांध कर ग्रामीण उसके साथ खेलते और खुशियां मनाते हैं।

गांव में एक भी पशु बीमार हुआ तो नहीं हाेता काेई उत्सव

रिटायर बैंक कर्मचारी सह समाजसेवी मोहन मुर्मू ने बताया सोहराय पर्व के पहले दिन पशुओं की पूजा की जाती है। पशुधन बैल और भैंसा के साथ कई तरह के आयोजन किए जाते हैं, जिसमें ग्रामीण बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। लेकिन अगर गांव में एक भी पशु बीमार है तो पूजा पाठ तो की जाती है लेकिन किसी तरह की कोई खुशी या उत्सव नहीं होता है। डुंगरीडीह के नायके साधुचरण मुर्मू ने बताया कि आदिवासी समाज की सोहराय पर्व पुरानी परंपरा है। साल भर खेती में पशुओं से काम करवाने के बाद सोहराय के मौके पर पशुओं की थकान दूर करने के लिए आराम दिया जाता है।

ये है परंपरा : संथाल समाज द्वारा सोहराय तीन दिनों का होता है, जिसमें सबसे पहले गोट पूजा की जाती है। इसमें मारंग बुरु, जाहेर आयो और अन्य आराध्य की पूजा की जाती है। पूजा के बाद मैदान मे एक अंडे को रख कर पूजा की जाती है और इसके बाद पूरे गांव के बैल गाय को मैदान में छोड़ दिया जाता है। इस दौरान जिस पशु के पैर से अंडा टूट जाता है या छू जाता है उस पशु को शुभ मानते हैं। खिचड़ी प्रसाद के रूप में खाया जाता है

खबरें और भी हैं...