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प्रदर्शन:एचसीएल के बंद पड़ी किशनगढ़िया माइंस को फिर से खोलने की मांग को लेकर ग्रामीणों ने दिया धरना

मुसाबनी16 दिन पहले
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  • माइंस में सोने का बेहतर ग्रेड के बाद भी आर्थिक मंदी का हवाला देकर कंपनी ने किया था बंद

हिन्दुस्तान काॅपर लिमिटेड के किशनगढ़िया माइंस को फिर से खोलने की मांग को लेकर स्थानीय बेरोजगार संघ किशनगढ़िया के बैनर तले ग्रामीणों ने गुरुवार को बंद पड़े माइंस परिसर में एक दिवसीय धरना दिया। इसके बाद प्रधानमंत्री के नाम बीडीओ सीमा कुमारी काे एक मांग पत्र भी सौंपा। मांगपत्र के माध्यम से इस बंद पड़े माइंस के खुलने से होन वाले रोजगार के सृजन, माइंस की वास्तविक स्थिति, माइंस की पांच विशेषताओं का भी उल्लेख किया गया है। इस विशेषताओं में रेल मार्ग, राष्ट्रीय राजमार्ग, उत्पादित अयस्क की पिसाई के लिए कस्ंट्रेटर प्लांट और बिजली की उपलब्धता के लिए पावर सब स्टेशन की कम दूर करने की आवश्यकता काे भी मांग पत्र में दर्शाया गया है।

इस एक दिवसीय धरना में संघ के अध्यक्ष सह ग्राम प्रधान अमर सिंह बानरा, सचिव इन्द्रजीत मार्डी, सलाहकार दाखिन हासंदा, अमर सिंह बानरा, दाशमत मुर्मू, विक्रम मार्डी, सिद्धार्थ सोरेन, पंचानंद मुर्मू, छोटराय हेम्ब्रम, यदूनाथ मार्डी, रामचंद्र सोरेन, कुशल मार्डी, ग्राम प्रधानों में धोबनी के लखन मार्डी, पाथरगोड़ा के सुदर्शन हासंदा, दुर्गाआटा के लोगन मार्डी, लाईनडीह के मंगल मुर्मू, टुमागंकोचा के सुपरा बिरहोर सहित 300 से ज्यादा ग्रामीण धरना में शामिल हुए। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि माइंस को खुलवाने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं।
किशनगढ़िया माइंस खुलने के साथ हुआ था बंद: आर्थिक मंदी का हवाला देकर वर्ष 1995 से 2003 तक आईसीसी यूनिट के सभी माइंस को बंद करने का अभियान चलाया था। इसी अवधि में एचसीएल के आईसीसी यूनिट के जीएम माइंस कमल चटर्जी के नेतृत्व में बंद किए बानालोपा एवं बदिया माइंस के स्क्रैप घोषित किए गए मशीनों एवं वाइंडर के जरिए अपनी जिद में किशनगढ़िया माइंस को खोलने का काम शुरु किया।

कमल चटर्जी की टीम में तत्कालीन डीजीएम सलीम खान, माइंस मैनेजर टोपनो साहब, सीनियर माइनिंग इंजीनियर कैल्वैन, माइनिंग इंजीनियर डीपी सिंह जैसे अधिकारियों ने 1953 में बंद हुए धोबनी माइंस को खोला और इसका वर्टिकल साफ्ट शुरू किया।

1996 में माइंस को खोलने का काम शुरू हुआ: वर्ष 1996 में माइंस को खोलने का काम शुरु हुआ। दो वर्षों में माइंस को उत्पादन लायक बना दिया। इस माइंस में भर्टिकल साफ्ट 55 मीटर गहराई तक निर्माण कराया गया था। लेकिन एचसीएल के तत्कालीन सीएमडी ने इन अधिकारियों को फटकार लगाते हुए बताया कि एक ओर हम माइंस को बंद कर मजदूरों को वीआरएस दिलाना चाह रहे है, वहीं आप लोग नया माइंस खोल रहे है। सीएमडी की फटकार के बाद एचसीएल के इस नये माइंस को इन अधिकारियों ने अपने दिल पर पत्थर रखकर प्रथम पाली में उत्पादन कर द्वितीय पाली से माइंस को हमेशा के लिए बंद कर दिया। ग्रेड एचसीएल के सभी माइंस से बेहतर था।

मुसाबनी ग्रुप ऑफ माइंस और आरसीपी के छह खदानों को किया गया था बंद

वर्ष 2003 तक आते आते मुसाबनी ग्रुप ऑफ माइंस तथा राखा काॅपर प्रोजेक्ट के सभी छह खदानों को अलाभकारी बताते हुए बंद कर दिया गया था। उस समय प्रबंधन ने तर्क दिया था कि इन सभी माइंस में उत्पादन के बजाय लागत बढ़ गयी थी। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तांबा केे मूल्य में भारी गिरावट आ गयी थी।

इस वजह से प्रबंधन को बाध्या होकर एक एक करके बानालोपा, बादिया, पाथरगोड़ा, केंदाडीह, राखामाइंस, सुरदा माइंस को बंद कर दिया गया था। सभी खदानों में करीब 10 हजार से ज्यादा मजदूर कार्यरत थे। सबसे पहले बानालोपा माइंस को बंद किया गया। उसके बाद बादिया को बंद किया गया। सबसे अंत में सुरदा माइंस को बंद करने का फरमान जारी किया गया।

उसके बाद जब तांबा के मूल्य में इजाफा होने लगी तो एचसीएल प्रबंधन ने फिर से केंदाडीह खदान को वर्ष 2007 में खोला। इसमें प्रोडक्शन शुरू किया गया। उत्पादन निजी हाथों में सौंप दिया गया था। उसकेे बाद लीज खत्म होने केे बाद फिर से अप्रैल 2020 से केेंदाडीह खदान को बंद कर दिया गया। इसके करीब 1500 मजदूर बेकार हो गए। वर्तमान हालात यह है कि अभी केंदाडीह माइंस भी लीज नवीकरण का बाट जोह रहा है। आईसीसी कारखाना भी अयस्क के अभाव में करीब एक साल से बंद पड़ा है।

माइंस खुलवाने को लेकर गोलबंद होकर आंदोलन करें ग्रामीण : जिप

जिला पार्षद बुद्धेश्वर मुर्मू ने कहा-हमारा क्षेत्र ताम्र बेल्ट के नाम जाना जाता है, इसमें बहू आयामी धातु उपलब्ध है। इस क्षेत्र में रोजगार के एक मात्र संसाधन माइंस हैं। सरकार यदि खोलती है तो बेरोजगार युवाओं को रोजगार के साथ-साथ क्षेत्र में आर्थिक और सामाजिक विकास तेजी से बढ़ सकता है और देश की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो सकती है।

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