गरीबों को शिक्षा का अिधकार सिर्फ 30%:10 साल में निजी स्कूलों ने आरटीई की 70% सीटें सामान्य छात्रों से भरी

जमशेदपुर2 महीने पहले
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शहर के निजी स्कूल शिक्षा के अधिकार अधिनियम (आरटीई) के तहत जरूरतमंद बच्चों (आरक्षित कोटे) का एडमिशन लेने में रुचि नहीं ले रहे हैं। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राज्य में आरटीई लागू हाेने के पिछले 10 सालाें में आरक्षित कोटे की 70 फीसदी सीटों को नहीं भरा जा सका।

इन सीटों पर स्कूलों ने सामान्य श्रेणी के बच्चों का दाखिला लिया है। दस साल में आरक्षित कोटे के तहत 21710 बच्चों की जगह 5694 (30 फीसदी)बच्चाें का एडमिशन शिक्षा विभाग करा सका है। इस अवधि में 16016 सीटें रिक्त रह गई, जिनसे स्कूलों ने करोड़ रुपए कमाए।

इन सीटों पर दाखिला देकर केवल ट्यूशन फीस से एक सत्र में इन स्कूलों ने 2000 रुपए महीना प्रति छात्र के हिसाब से करीब 38.43 करोड़ रुपए कमाए।

शहर के 60 निजी स्कूलाें में इंट्री कक्षा की कुल 8684 सीटें है। आरटीई के तहत इसमें से 25 प्रतिशत सीट गरीब व अभिवंचित वर्ग के बच्चाें के लिए आरक्षित हैं। यानी कुल 2171 सीट आरक्षित हैं।

राज्य के स्कूलाें में सत्र 2012-13 से आरटीई के तहत सीट निर्धारित हैं और एडमिशन भी हाे रहा है। लेकिन कभी भी आरक्षित सीटाें पर 100% नामांकन शिक्षा विभाग सुनिश्चित नहीं करा पाया है। 2012 से 2021 तक नामांकन वर्ष के अनुसार आरक्षित वर्ग की कुल 21710 सीटें हाेती हैं।

जानिए... क्यों नहीं भरती सीटें

1.प्राथमिक शिक्षा निदेशालय के आदेश के तहत निजी स्कूलाें काे आरक्षित वर्ग की रिक्त सीटाें को खाली रखना था, लेकिन स्कूलाें ने तीन महीने के बाद ही इसे सामान्य वर्ग के बच्चाें से भर लिया। 2 .रिक्त सीटाें काे भरने के लिए डीएसई कार्यालय काे जिम्मेदारी दी गयी है।

आस पास की बस्तियाें में गरीब परिवाराें तक पहुंच कर उनके बीच जागरूकता लाकर रिक्त सीटाें काे निम्न आय वर्ग के अभिभावकों के बच्चाें का नामांकन कराएं, लेकिन किसी भी साल ऐसा नहीं हुआ।

3.साकची व बिष्टुपुर के निजी स्कूलाें ने कैचमेंट एरिया का हवाला देकर दूर दराज के बच्चाें का आरक्षित सीटाें पर दाखिला नहीं लिया, जिससे उनके यहां सीटें रिक्त रही गईं।

पैसों का खेल : शहर के 60 स्कूल आरक्षित सीटों पर सामान्य एडमिशन देकर हर साल 35 से 40 करोड़ कमा रहे

इस सत्र में अबतक सिर्फ 900 आवेदन ही आए हैं

इस बार आरक्षित श्रेणी की सीटाें पर नामांकन के लिए कुल 900 आवेदन आए हैं। इसकी मुख्य वजह आय प्रमाणपत्राें का आसानी से नहीं बनना है। आरक्षित सीटाें पर उन्हीं बच्चाें का नामांकन हाेता है जिनके अभिभावकाें की अधिकतम सालाना आय 72 हजार रुपए है।

2019-20 में सबसे अधिक 1100 का हुआ था नामांकन

आरटीई लागू हाेने के बाद सबसे अधिक 1100 बीपीएल बच्चाें का नामांकन वर्ष 2019-20 में हुआ था। इससे पहले 2018-19 में 737 बच्चों का नामांकन हुआ था। इस वर्ष 900 आवेदन आए हैं, जिन्हें विभाग संबंधित स्कूलों को भेज रहा है।

आरटीई की फी 425 रुपए, सामान्य श्रेणी की फी औसतन 2000
निजी स्कूल आरक्षित श्रेणी की सीटाें काे तीन महीने तक खाली रखते हैं, इसके बाद इसे सामान्य श्रेणी के बच्चाें से भर देते हैं। उनका तर्क है कि आरक्षित श्रेणी की उन सीटाें के लिए ही सरकार फीस का भुगतान करती है जिस पर नामांकन हाेता है, जो मात्र 425 रुपए महीना है। वहीं ये सीटें सामान्य श्रेणी के बच्चों से भरने के बाद स्कूल उनसे फी के रूप में 1600 से 2500 रुपए महीना लेते हैं।

जिला स्तर पर बरती गई है लापरवाही
यह सही है कि निजी स्कूलाें के आरक्षित श्रेणी की सीटाें पर अपेक्षा के अनुसार नामांकन नहीं हाे पाया है। इसके कई वजह हैं। जिला स्तर पर कहीं न कहीं इसमें लापरवाही बरती गयी है। विभाग का निर्देश है कि आरक्षित काेटे की सीटाें काे इसी वर्ग के बच्चाें से भरवाना है। इसके बाद भी देखने काे मिल रहा है कि स्कूल इसे सामान्य वर्ग के बच्चाें से भर रहे हैं।
-राजेश शर्मा, शिक्षा सचिव, झारखंड​​​​​​​

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