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गुरू पूर्णिमा पर विशेष:गुरु की आज्ञा से साइंस छोड़ पढ़े संस्कृत, गोल्ड मेडल लिया और बने प्रोफेसर

जमशेदपुरएक महीने पहले
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  • तीन ऐसे शिष्यों की कहानी जो गुरु की आज्ञा मानकर जीवन में सफल हुए

रविवार काे गुरु पूर्णिमा है। यह गुरु-शिष्य परंपरा का दिन है। कोरोना के चलते इस बार शहर में गुरुओं के सम्मान में सामूहिक कार्यक्रम नहीं होंगे। लोग घरों मेंं ही गुरु का पूजन कर सम्मान जताएंगे। गुरु शिष्यों को सीख देते हैं- शिक्षा अपने लिए ग्रहण कराे, लेकिन उसका लाभ हमेशा दूसराें काे दाे। अगर कुछ काे भी जीवन जीने की सही दिशा दे पाए ताे यह सबसे बड़ा काम हाेगा। तीन ऐसे शिष्यों की कहानी जो गुरु की आज्ञा मानकर जीवन में सफल हुए

राजेश प्रसाद : कोचिंग में पढ़ने के पैसे नहीं थे तो गुरु ने नि:शुल्क पढ़ाया और बन गए डिप्टी कलेक्टर 

लातेहार के बरवाडीह निवासी कोल्हान प्रमंडल के उपश्रमायुक्त राजेश प्रसाद की सफलता में गुरु की अहम भूमिका रही है। 1994 में स्नातक पास करने के बाद राजेश ने 40वीं बीपीएससी की परीक्षा दी। पहली बार में ही आरंभिक परीक्षा पास की, लेकिन मेंस पास नहीं कर सके। शादी हो चुकी थी, ट्यूशन पढ़ा घर चलाते थे।

बीपीएससी की कोचिंग करना चाहते थे, पर पैसे नहीं थे। उन्होंने शिक्षक एके मिश्रा को समस्या सुनाई। उन्होंने नि:शुल्क कोचिंग कराया। गुरु के मार्गदर्शन से दूसरी बार में ही राजेश ने बीपीएससी की 41वीं परीक्षा का पीटी व मेंस दोनों पास कर ली। वे अगस्त 1998 में डिप्टी कलेक्टर बन गए। 

डाॅ. सुनील मुर्मू : नेतरहाट में पढ़ने के दौरान डॉ. अवध बिहारी की बात मानने से बदल गया जीवन

सिंहभूम काॅलेज, चांडिल में डाॅ. सुनील मुर्मू संस्कृत में सहायक प्रोफेसर हैं। डाॅ. सुनील ने बताया कि वे नेतरहाट में इंटर में साइंस में पढ़ रहे थे। इसी दौरान संस्कृत के शिक्षक डाॅ. अवध बिहारी दुबे ने उन्हें साइंस छोड़ संस्कृत पढ़ने को कहा। वे संकाय बदल कर संस्कृत पढ़ने को तैयार हो गए।

इसके बाद बीएचयू में पढ़ाई की, गोल्ड मेडलिस्ट बने। दिल्ली में प्लस टू स्कूल में संस्कृत शिक्षक रहे। इसके बाद 2008 में केयू में संस्कृत में अस्सिटेंट प्रोफेसर के रूप में नौकरी पाई। डाॅ. सुनील ने मुंशी प्रेमचंद का उपन्यास निर्मला का संथाली में अनुवाद किया है। जल्द ही संथाली भाषा में यह पुस्तक उपलब्ध होगी।

प्राे गंगाधर पांडा : गुरु ने कहा- कभी नकारात्मक भाव मत पालना, मैंने इसे अपने जीवन में उतारा

काेल्हान विश्वविद्यालय के कुलपति प्राे गंगाधर पांडा कहते हैं कि गुरु वहीं हाेता है जाे जीवन के अंधकार काे दूर करे। मेरे जीवन का अंधकार दूर करने वाले गुरु थे पद्मश्री वी वेंकटाचलम व श्रीनिवास रथ। 1976 में उज्जैन में एमए में नामांकन लेने के बाद वी वेंकटाचलम का आशीर्वाद मिला। साेच से ही संभव है।

उनकी प्रेरणा से ही मैं शिक्षक बना। प्राे पांडा ने कहा कि उन्हाेंने विद्यार्थी जीवन से ही कभी नकारात्मक भाव नहीं पाला। क्याेंकि मेरे गुरु कहते थे कि नकारात्मकता हमेशा पीछे ले जाती है। गुरु बिना ज्ञान व सफलता संभव नहीं है। इनके दिखाए मार्ग और मदद से ही लोग जीवन में आगे बढ़ते हैं। 

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