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लॉकडाउन का खेतों पर दिखने लगा प्रभाव:फसल की लागत भी नहीं मिल पाने से किसान परेशान, छोटे व्यापारी सस्ते में खरीद बेच रहे महंगे दाम पर सब्जी

​​​​​​​मरकच्चो (कोडरमा)2 महीने पहले
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लॉकडाउन की वजह से बड़े व्यापारी खेतों तक नहीं पहुंच रहे और मजबूरन किसानों को छोटे सब्जी विक्रेताओं को बेचना पड़ रहा है। - Dainik Bhaskar
लॉकडाउन की वजह से बड़े व्यापारी खेतों तक नहीं पहुंच रहे और मजबूरन किसानों को छोटे सब्जी विक्रेताओं को बेचना पड़ रहा है।

कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण को रोकने के लिए जारी लॉकडाउन (स्वस्थ्य सुरक्षा सप्ताह) का असर अब खेतों पर भी दिखने लगा है। खेतों में अनुमान के मुताबिक सब्जियों की पैदावार हुई है। पर खरीदार नहीं मिलने से किसान परेशान हो गए हैं। लॉकडाउन की वजह से बड़े व्यापारी खेतों तक नहीं पहुंच रहे और मजबूरन किसानों को छोटे सब्जी विक्रेताओं को बेचना पड़ रहा है। जो किसानों से तो सस्ते में सब्जी खरीद रहे हैं पर ग्राहकों को मंहगे दाम पर बेच रहे हैं। किसानों को सब्जी की पैदावार के लिए किया गया खर्च भी निकालना मुश्किल हो गया है।

इसी तरह का नजारा इन दिनों डोमचांच प्रखंड के फुलवरिया, पुरनाडीह आदि गांव के किसानों के समक्ष देखने को मिल रहा है। इसके कारण सब्जी की खेती करने वाले किसानों की चिंता लगातार बढ़ती ही जा रही है। किसान तैयार फसल को खेतों में ही छोड़ने को मजबूर हो गए हैं। आलम यह है कि किसान खुद से सब्जी तोड़ते हैं और औने-पौने दाम में छोटे-छोटे सब्जी विक्रेताओं के यहां बेच दे रहे हैं। वहीं, शहरों में लोगों तक यही सब्जी महंगे दाम में पहुंच रही है।

मालूम हो कि फुलवरिया, पुरनाडीह, धरगांव आदि आसपास के कई गांवों के किसान के परिवार खेती पर निर्भर है। यहां के अधिकांश लोग सालों भर खेती कर अपना तथा परिवार का जीवन यापन करते हैं। किसानों ने बताया कि कोरोना संक्रमण को लेकर अगर लगातार लॉकडाउन की यही स्थिति रही तो हम सब आर्थिक तंगी के कगार पर पहुंच जाएंगे। किसानों ने बताया कि लॉकडाउन के कारण भले ही बाजार में सब्जी ऊंचे दामों में बेची जा रही है। लेकिन हम किसानों को फसलों की सही कीमत भी नहीं मिल रही है।

किसान ललिता देवी, माया देवी, भीमसेन मेहता ने बताया कि खेत में फसल रहने के कारण बे मौसम बरसात के कारण बर्बाद हो रहे हैं। उन्होंने अपनी पीड़ा सुनाते हुए बताया कि एक तो महाजन से कर्ज लेकर खेती करने का खर्च, उस पर सब्जी तोड़ने की मजदूरी लग जाता है। इसके बाद जो बचता है उसका दाम भी नहीं मिल रहा है। जैसे बाजार में 10 से 15 रुपए किलो बिक रहा खीरा किसानों से 3 से 4 रुपए किलो में खरीदा जा रहा है। इसी तरह बाजार में 30 से 35 रुपए किलो बिक रही भिंडी व झींगी को किसान से 7 से 8 रुपए में बेंचने को मजबूर हैं। वहीं कद्दू और टमाटर किसान से 4 से 5 रुपए किलो में खरीदा जा रहा है। जबकी शहरों में यही टमाटर व कद्दू को 10-15 रुपए किलो में बेचा जा रहा है।

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