मुर्मू का क्लर्क से अब तक का सफर:राशन कार्ड बनवाने राजभवन पहुंच जाते थे लोग, अब उम्मीद राष्ट्रपति भवन में भी साथ देंगी मां

महुलडीहा (ओडिशा)12 दिन पहले

ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से 287 KM और मयूरभंज जिला मुख्यालय से 82 KM दूर रायरंगपुर के महुलडीहा गांव में चहल-पहल है। करीब 6,000 की आबादी वाले इस गांव में हर किसी के चेहरे पर मुस्कान और गर्व साफ झलक रहा है। गांव के चारों तरफ सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त हैं। मंगलवार शाम तक सामान्य रहने वाले गांव का जोश अब देखते ही बनता है। इसका कारण हैं द्रौपदी मुर्मू। BJP नीत NDA ने जैसे ही उनको राष्ट्रपति का उम्मीदवार घोषित किया, बधाई देने वालों का तांता लग गया।

पढ़िए राष्ट्रपति उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के गांव से दैनिक भास्कर संवाददाता ऋषिकेश सिंहदेव की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट-

आयरन ओर (लौह अयस्क) के लिए मशहूर रायरंगपुर तहसील से 25 KM दूर बढ़ते ही एक पक्की सड़क मिलती है, जो सीधे महुलडीहा गांव पहुंचाती है। यहां पहुंचने के रास्ते में बीच-बीच में जंगल भी है। भास्कर टीम जैसे ही गांव में घुसी, चारों तरफ सुरक्षाकर्मी खड़े नजर आए। ग्रामीण भी उत्साहित होकर बाहर से आने वाले मीडियाकर्मियों और लोगों का गर्मजोशी से स्वागत करते दिखे। गांव में कुछ मकान कच्चे हैं, कुछ पक्के। यहां मूलभूत सुविधा की कोई कमी नहीं है। पूरा गांव डिजिटल सुविधाओं से लैस है।

द्रौपदी मुर्मू गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलीं। वे राष्ट्रपति चुनाव के लिए बतौर NDA कैंडिडेट 24 जून को अपना नॉमिनेशन फाइल करेंगी।
द्रौपदी मुर्मू गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलीं। वे राष्ट्रपति चुनाव के लिए बतौर NDA कैंडिडेट 24 जून को अपना नॉमिनेशन फाइल करेंगी।

जब हम द्रौपदी मुर्मू के घर की ओर बढ़े तो उनके घर से कुछ ही दूरी पर कुछ लोग खड़े मिले। जैसे ही उनसे बातचीत शुरू हुईं, उनकी आंखें खुशी से डबडबा गईं। मुर्मू को राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार जताते हुए इन लोगों ने कई कहानियां सुनाईं।

द्रौपदी मुर्मू के झारखंड की राज्यपाल रहने के दौरान के किस्से सुनाते हुए कुछ लोगों ने बताया, 'वह इतनी विनम्र और मिलनसार हैं कि पूछिए मत। रांची राजभवन में तो गांव के लोग राशन कार्ड बनवाने से लेकर जमीन का विवाद सुलझाने की गुहार लगाने पहुंच जाते थे। इसके बावजूद उन्होंने कभी हमें निराश नहीं किया। हर संभव मदद की। वह हमेशा अपने क्षेत्र के लोगों की हर छोटी-बड़ी मुश्किल में खड़ी रहीं।'

द्रौपदी मुर्मू ने गुरुवार को गृह मंत्री अमित शाह से भी मुलाकात की।
द्रौपदी मुर्मू ने गुरुवार को गृह मंत्री अमित शाह से भी मुलाकात की।

हमेशा सबके लिए खुले रहे दरवाजे

स्थानीय लोगों ने बताया, 'उनका निजी जीवन परेशानियों से भरा रहा। पर इसका असर उन्होंने सार्वजनिक जीवन पर नहीं पड़ने दिया। पति और दो बेटों के आकस्मिक निधन का आघात झेलने के बाद भी उनके चेहरे पर मुस्कान बनी रही। उनके घर के दरवाजे हमेशा गरीब और आम आदमी के लिए खुले रहे। बीजद-भाजपा की सरकार में मंत्री रहते हुए एक तरफ उन्होंने अपने इलाके में पुल और सड़कें बनवाई, वहीं बच्चियों की सुविधा के लिए स्कूल भी खुलवाए। अपने गांव को डिजिटल गांव के रूप में विकसित कराया। साथ-साथ कई बार निजी तौर पर लोगों की आर्थिक मदद भी की।'

लोगों को उम्मीद, हर परेशानी होगी दूर

दैनिक भास्कर से बातचीत करते हुए स्थानीय निवासी शुभोदीप प्रधान ने कहा, 'जिस तरह झारखंड की राज्यपाल रहते हुए द्रौपदी मां के दरवाजे लोगों के लिए खुले रहे, ठीक उसी तरह हमें उम्मीद है कि देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति बनने के बाद भी जनता के लिए उनके दरवाजे खुले रहेंगे।'

झारखंड में कुलाधिपति रहीं द्रौपदी मुर्मू के साथ काम कर चुकी कोल्हान विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति डॉ. शुक्ला माहांती ने कहा, 'यह सभी महिलाओं के लिए सम्मान की बात है। सही मायने में हम आज ही महिला दिवस मना रहे हैं।'

गांव के ही अर्जुन मुर्मू ने बताया, 'बतौर जनप्रतिनिधि द्रौपदी मुर्मू ने इलाके में बहुत काम किया। गांव में पानी पहुंचाने से लेकर सड़कों तक का विकास कराया। शौचालय का निर्माण कराया। लोगों को अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रेरित किया। राजनीति में जाने से पहले वह अपने घर पर गांव के बच्चों को बुलाकर खुद भी पढ़ाती थीं।'

रायरंगपुर नगर परिषद कार्यालय जहां द्रौपदी मुर्मू ने अपनी सेवाएं दी थीं।
रायरंगपुर नगर परिषद कार्यालय जहां द्रौपदी मुर्मू ने अपनी सेवाएं दी थीं।

सरकारी स्कूल से की पढ़ाई, कोई साथी नहीं पढ़ता था तो टोक देती थीं

द्रौपदी मुर्मू ने अपनी पढ़ाई सरकारी स्कूल ऊपरबेड़ा से की थी। उनके साथ पढ़ने वाले हरिहर नंद ने बताया, 'उनका स्वभाव बचपन से ही बहुत सरल था। जिन सहपाठी का पढ़ने में मन नहीं लगता था, उनको टोकती भी थीं। सबसे बातें करती थीं। हम लोग जब स्कूल जाते थे तो हमारे पैरों में चप्पल नहीं होती थी। बैठने के लिए घर से चटाई या बोरा लेकर जाना पड़ता था। उस वक्त के हालात में भी रोज स्कूल जाती थीं। उनको अगर कहीं भी धार्मिक पुस्तक मिले, उसे जरूर उठाकर पढ़ती थीं।'

उन्होंने बताया, 'आगे चलकर वह बच्चों को मातृभाषा पढ़ाती थीं। विशेषकर छात्रों की शिक्षा पर ज्यादा जोर देती थीं। जीवन के शुरुआती दिनों से ही उन्हें भगवान पर अटूट विश्वास रहा है। बेटे और पति की मौत के बाद काफी लंबा समय ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के सत्संग में गुजारती थीं।'

ऊपरबेड़ा के इसी सरकारी स्कूल में द्रौपदी मुर्मू ने की थी पढ़ाई।
ऊपरबेड़ा के इसी सरकारी स्कूल में द्रौपदी मुर्मू ने की थी पढ़ाई।

स्कूल के एक शिक्षक ने बताया, 'देश की राष्ट्रपति के उम्मीदवार के रूप में मुर्मू के चयन के बाद से ही स्कूल के बच्चों में जबरदस्त उत्साह है। बच्चों ने उनसे मांग की है कि वह राष्ट्रपति बनकर एक बार अपने स्कूल जरूर आएं।'

उन्होंने यहां शिक्षा को बढ़ावा देने की लगातार कोशिशें कीं। महिलाओं काे शिक्षित करने के लिए उनके समर्पण और सोच का ही परिणाम रहा कि झारखंड में पहले महिला विश्वविद्यालय का शिलान्यास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फरवरी 2019 में किया। इससे पहले उन्होंने 2010 में अपने ससुराल में करीब छह एकड़ जमीन एक शिक्षण संस्थान को दान कर दी थी।

मुर्मू ने शिक्षिका के रूप में अरविंदो पूर्णांग शिक्षा केंद्र में दी थी अपनी सेवाएं।
मुर्मू ने शिक्षिका के रूप में अरविंदो पूर्णांग शिक्षा केंद्र में दी थी अपनी सेवाएं।

आज भी स्कूल में रखी है कुर्सी, रजिस्टर में दर्ज है नाम

द्रौपदी मुर्मू ने अपने जीवन की शुरुआत बेहद मुश्किल हालात में की। उन्होंने क्लर्क के रूप में काम किया। बाद में शिक्षिका के रूप में पढ़ाया। पार्षद के रूप में राजनीतिक करियर की शुरुआत की। इसके बाद विधायक, मंत्री होते हुए वे राज्यपाल की कुर्सी तक पहुंचीं। जिस स्कूल में वह पढ़ाती थीं, वहां आज भी उनकी कुर्सी, रजिस्टर मौजूद हैं। नगर परिषद में भी उनकी कुर्सी सुरक्षित रखी गई है। इलाके के लोग आज भी उन्हें अपना सबसे अच्छा जनप्रतिनिधि मानते हैं। वह रायरंगपुर नगर परिषद की 1997 से 2002 तक वाइस चेयरमैन रहीं। अरविंदो पूर्णांग शिक्षा केंद्र में उन्होंने बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा दी।

पति और दोनों बेटों की मौत के बाद डिप्रेशन में चली गई थीं

द्रौपदी मुर्मू आदिवासी संथाल समाज से आती हैं। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि उनका परिवार बहुत गरीब था, लिहाजा उनका शुरुआती मकसद सिर्फ छोटी-सी नौकरी करके परिवार पालना था। उनकी नौकरी लग भी गई, लेकिन ससुराल वालों के कहने पर छोड़नी पड़ी। जब उनका मन नहीं लगा तो बच्चों को मुफ्त में पढ़ाना शुरू किया। यहीं से उनकी समाजसेवा की शुरुआत हुई।

1997 में उन्होंने पहली बार रायरंगपुर नगर पंचायत के काउंसलर का चुनाव लड़ा और जीत गईं। 2000 में उन्हें विधायक का टिकट मिला और वे यह चुनाव भी जीत गईं। इसके बाद वे मंत्री बनीं। 2009 में चुनाव हारने के बाद वे गांव आ गईं। मगर अक्टूबर 2010 में बेटे की गांव के पास ही सड़क दुर्घटना में मौत हो गई, जिसके बाद वे डिप्रेशन में चली गईं। जैसे-तैसे वे एक बेटे की मौत के सदमे से बाहर आई थीं कि 2013 में भुवनेश्वर में दूसरे बेटे की भी हादसे में मौत हो गई। फिर 2014 में उन्होंने पति को भी खो दिया। इसके बाद वे पूरी तरह टूट गई थीं, पर हिम्मत जुटाकर उन्होंने खुद को समाजसेवा में झोंक दिया।

परिवार में सिर्फ बेटी-दामाद हैं

मुर्मू के परिवार में एक बेटी और दामाद हैं। बेटी की शादी झारखंड में हुई है। बेटी के ससुर धर्मो चरण हांदसा भी बुधवार को अपनी समधन से मुलाकात के लिए पहुंचे थे। उन्होंने बताया, 'बहुत खुशी और गर्व की बात है कि बेटे की सास देश की नई राष्ट्रपति बनेंगी।' द्रौपद्री मुर्मू का मायका ऊपरबेड़ा में है, ससुराल पहाड़पुर में है।

रायरंगपुर में द्रौपदी मुर्मू की ओर से बनवाया गया स्मारक।
रायरंगपुर में द्रौपदी मुर्मू की ओर से बनवाया गया स्मारक।

द्रौपदी मुर्मू के नाम दर्ज हैं कई कीर्तिमान

साधारण संथाली आदिवासी परिवार की मुर्मू के नाम कई कीर्तिमान हैं। वह झारखंड की पहली महिला राज्यपाल रहीं। उनका सबसे लंबा कार्यकाल रहा। अपने फैसलों से उन्होंने हमेशा लोकतंत्र को मजबूत करने का काम किया। बतौर राज्यपाल उन्हें झारखंड की राजनीति में सत्ता-पक्ष और विपक्ष दोनों का विश्वास प्राप्त था। विपक्षी दलों की मांग पर उन्होंने भाजपा के रघुवर दास सरकार की ओर से CNT-SPT एक्ट से जुड़े विधेयक को वापस कर दिया।

झारखंड में सत्ता बदलने के बावजूद राज्य में राज्यपाल के तौर पर उन्हें मौजूदा सत्ता पक्ष ने पूरा सम्मान दिया। उन्हें झारखंड सरकार ने यादगार विदाई दी। झारखंड में संविधान के अधिकार को लेकर शुरू हुए पत्थलगड़ी आंदोलन को भी उन्होंने वार्ता के जरिए हल कराने का प्रयास किया। राज्यपाल का कार्यकाल खत्म होने के बाद वह फिलहाल रांची के राजभवन से आकर टाटा-रायरंगपुर रोड के किनारे स्थित अपने आवास में रह रही थीं।

रायरंगपुर में स्थापित द्रौपदी मुर्मू के पति और बेटों की प्रतिमाएं।
रायरंगपुर में स्थापित द्रौपदी मुर्मू के पति और बेटों की प्रतिमाएं।