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आस्था या अंधश्रद्धा?:कोविड-19 पर कंट्रोल के लिए 'कोरोना माई' की पूजा की, अब 'भौजी साड़ी' के जरिए कोरोना महामारी टालने की कोशिश

रामगढ़ (रजरप्पा)13 दिन पहले
भौजी साड़ी का कॉन्सेप्ट कहां से आया, यह बताने की स्थिति में कोई नहीं है। लेकिन, इस नुस्खे को पूरा करने के लिए मंदिरों में पूजा के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग का पूरी तरह से धज्जियां उड़ रही हैं।
  • कोरोना से रक्षा के लिए ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं पूजा कर मायके में भाभियों के लिए भेज रहीं हैं साड़ियां और श्रृंगार सामग्री
  • भीड़ में महिलाएं नदियों और जलाशयों में स्नान के लिए पहुंच रही हैं, पूजा के दौरान नहीं हो पा रहा है सोशल डिस्टेंसिंग का पालन

कहा जाता है कि आस्था पर किसी का बस नहीं चलता, यही कारण है कि एक ओर विश्वभर में वैज्ञानिक कोरोनावायरस की वैक्सीन तैयार करने में जुटे हैं। वहीं, ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं कोरोनावायरस पर कंट्रोल के लिए ‘कोरोना माई’ की पूजा से लेकर ‘भौजी साड़ी’ जैसे नुस्खा आजमा रही हैं। पिछले एक सप्ताह के दौरान झारखंड के कई जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों में यह अफवाह फैली हुई है कि विवाहिता ननद अपने मायके की भाभियों के लिए साड़ी और श्रृंगार की सामग्री भेजेंगी तो उनके परिवार को कोरोनावायरस से बचाया जा सकता है। यही वजह है कि हर दिन भीड़ में महिलाएं नदियों में स्नान के बाद मंदिर में पूजा करने पहुंच रहीं। इसके बाद मायके की भाभियों को साड़ी के साथ श्रृंगार सामग्री भिजवा रही हैं। रविवार को रामगढ़ जिले के चितरपुर देवी मंडप में ऐसे ही सैकड़ों ननदों की भीड़ पूजा-अर्चना के लिए देखी गई। सभी के हाथों में साड़ी और श्रृंगार का सामान था।

सोशल डिस्टेंसिंग का नहीं हो रहा है पालन, किसी महिला ने नहीं लगाया था मास्क
भौजी साड़ी का कॉन्सेप्ट कहां से आया, यह बताने की स्थिति में कोई नहीं है। लेकिन, इस नुस्खे को पूरा करने के लिए मंदिरों में पूजा के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग का पूरी तरह से धज्जियां उड़ रही हैं। कोई भी महिला मास्क पहने हुए नहीं दिख रही है। आस्था अपनी जगह है लेकिन महिलाओं को कोविड-19 से बचाव के लिए जारी दिशा-निर्देशों का पालन जरूर करना चाहिए।

देवी मंडप में भीड़ लगाकर पूजा करती महिलाएं।
देवी मंडप में भीड़ लगाकर पूजा करती महिलाएं।

क्या कहती हैं महिलाएं
भौजी साड़ी के साथ पूजा के लिए रविवार को चितरपुर स्थित देवी मंडप आई मायल की कौशल्या देवी ने बताया कि हमारे मायके कसमार (जिला बोकारो) से भी ननंद ने साड़ी और श्रृंगार की सामग्री भेजी है, इसलिए हमें भी फर्ज बनता है कि हम भी अपनी भाभियों के लिए साड़ी भेजें। महिला के अनुसार, परिवारों को इस महामारी में बीमारी से बचाने के लिए यह करना जरूरी है। पूजा करने पहुंची एक महिला ने कहा कि ननद अपनी भाभियों को साड़ी भेज रही हैं। मुझे भी साड़ी मिली है, मैं भी पूजा करके साड़ी भेज रही हूं। साड़ी भेजने से क्या होगा, पूछने पर महिला ने बताया कि मुझे ये तो नहीं पता लेकिन सभी महिलाएं कर रही हैं तो मैं भी ऐसा कर रही हूं।

उधर, इस आस्था और अंधविश्वास के कारण कपड़ों की दुकानों में लॉकडाउन के कारण धीमी पड़ी बिक्री ने एक बार फिर रफ्तार पकड़ ली है। बाजार के कई दुकानदारों ने बताया कि लॉकडाउन के दौरान दुकानें बंद थी, कमाई नहीं हो रही थी। अब चार-पांच महीनों के बाद दुकानें खुली हैं तो आस्था ही सही, साड़ियों और श्रृंगार के समानों की बिक्री ने रफ्तार पकड़ ली है।

नदी में नहाने के बाद मंदिर की ओर साड़ी लेकर जातीं महिलाएं।
नदी में नहाने के बाद मंदिर की ओर साड़ी लेकर जातीं महिलाएं।

अंधविश्वास और रुढ़ीवादिता के चक्कर में कर्ज ले रही है महिलाएं
छात्र संघ के उपाध्यक्ष अनुराग भारद्वाज की मानें तो राज्यभर के ग्रामीण महिलाएं अंधविश्वास और रुढ़ीवादिता के चक्कर में पड़कर भौजी साडी पहुंचा रही है। इसके लिए महिलाएं कर्ज भी ले रही है। इस अंधविश्वास में ज्यादातर राज्य के आदिवासी मूलवासी समाज की महिलाएं फंस रही है।

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