इबादत / बरकत का महीना है रमजान : जमाल

Ramadan is the month of Barkat: Jamal
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Ramadan is the month of Barkat: Jamal

दैनिक भास्कर

May 23, 2020, 05:00 AM IST

गढ़वा. रमजान का महीना बरकत वाला महीना है। इस महीने में जन्नत के तमाम दरवाजे खोल दिए जाते हैं और जहन्नम के तमाम दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। उक्त बातें हज्जन सफुरा खातून इंटर कॉलेज धुरकी(गढ़वा)के प्रधान सहायक जमाल अंसारी ने कहीं। 
उन्होंने कहा कि इस महीने में तीन अशरा होता है। पहला अशरा रहमत का, दूसरा मगफिरत का और तीसरा अशरा जहन्नम से निजात का है। रमजान के महीने में एक दिन का रोजा रखना अन्य एक हजार दिनों के रोजे रखने से अफजल माना जाता है। यह महीना अपने दामन में रहमतों का खजाना लेकर आता है। इसी महीने में कुरान पाक नाजिल किया गया है। अल्लाह ने इस महीने में रोजा रखने का हुक्म इसलिए दिया कि हर मोमिन को गरीब एवं तंसदस्ती में मुब्तला और भूख प्यास से बिलखते इंसानों के दर्द एवं गम का एहसास हो जाए। ताकि अहले सरवत लोग जरूरतमंदों व गरीबों को जकात व सदका देने में हरगिज कोताही ना करें। इस महीने में अल्लाह नफली नमाज पढ़ने वालों को फ़रायज़ के बराबर और फ़रायज़ पढ़ने वालों के सवाब को 70 गुना बढ़ाकर अता करता है। यह रमजान का महीना यकीनन दुआओं की कबूलियत का महीना होता है। इस महीना को अल्लाह का महीना भी कहा जाता है। इसी महीने में मुसलमान इबादत की बदौलत अपने आप को पहले से ज्यादा अल्लाह तआला के करीब समझता है। इस महीने में एक रात शबे कद्र की रात है। जो हजार महीनों से बेहतर है। रमजान के महीने में रोजा रखने के साथ-साथ पांच वक्त की नमाज, तरावीह, कुरान की तिलावत किया जाता है। 
इस महीने में ज्यादा से ज्यादा अल्लाह की इबादत, तहज्जूद नमाज की पाबंदी, तरावीह का एहतमाम, रोजा इफ्तार कराने का एहतमाम, सढका व खैरात का एहतमाम करना चाहिए। रमजान में सेहरी की भी बड़ी फजीलत है। रोजा ढाल है। जहन्नम से आजादी का एक अहम जरिया भी है। रोजा इंसान के जिस्म की जकात है। रोजा नूर है। रोजा इंसान के लिए शिफा का पयाम है। रोजेदार जब तक रोजे में रहते हैं। फरिश्ते उनके लिए मगफिरत के लिए दुआ करते हैं। रोजा अल्लाह और बंदे के बीच का राज है।

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