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बेहतर पर्यावरण का असर...:समय से पहले ही आने लगे विदेशी मेहमान, 11 हजार किमी दूर अमेरिका से आए

हजारीबागएक महीने पहले
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  • भोजन की तलाश में वेगटेल पक्षी की 3 प्रजातियाें ने हजारीबाग में डाला डेरा, अक्टूबर में आते थे, इस बार सितंबर में ही पहुंचे

लॉकडॉउन के कारण सुधरे पर्यावरण का असर पक्षियों के माइग्रेशन पर भी पड़ा है। वेगटेल (खंजन) नाम की चिड़िया सामान्यतः सितंबर के दूसरे पखवाड़े से अक्टूबर के बीच हजारीबाग पहुंचती थी। इस बार सितंबर के पहले सप्ताह में ही वेगटेल की तीन प्रजातियां व्हाइट वेगटेल, येलो वेगटेल और ग्रे वेगटेल हजारीबाग पहुंच गए हैं। येलो वेगटेल या पीला खंजन लगभग 11 हजार किलोमीटर की दूरी तय कर हजारीबाग पहुंचा है। यह सर्दियों में नॉर्थ अमेरिका से एशिया के कई देशों में माइग्रेट करते हैं। हजारीबाग से नॉर्थ अमेरिका की दूरी लगभग 11000 किलोमीटर है। इसके माइग्रेशन रूट में समुद्र भी है।

छोटी सी चिड़िया समुद्र को भी पार कर यहां पहुंचती है। इसे घास के मैदान और पानी वाले स्थान के आसपास देखा जा सकता है। घास के बीज इनका प्रिय भोजन है। जमीन पर बैठने पर इसकी पूंछ ऊपर नीचे हिलते रहती है। इसी वजह से इसका नाम वेगटेल पड़ा। पक्षी उन्हीं रास्तों से आते हैं, जिनसे उनके पहले भी चिड़िया अाई होती है। पक्षी अपने पूर्वजों के प्रवासी मार्ग का अनुसरण करते हुए गर्म क्षेत्रों में सर्दिया बिताते हैं। माइग्रेशन पक्षी को जिंदा रखने और उनकी वंश वृद्धि में सहायक है।

क्यों होता है माइग्रेशन...

माइग्रेशन का पारिस्थितिक महत्व है। प्रवास के कई पारिस्थितिक कारण है। कुछ क्षेत्रों के खाद्य संसाधन कम हो जाते हैं। जिस स्थान पर पड़नेवाली सर्दी में अधिकतम उतार-चढ़ाव होता है। वहां से भी पक्षी माइग्रेट करते हैं। माइग्रेशन वाले स्थान का चयन भोजन की उपलब्धता और बेहतर या अनुकूल जलवायु के उपर भी निर्भर करता है। आर्कटिक क्षेत्र में गर्मी के दौरान वनस्पति और जीव बढ़ जाते हैं। घास का बीज खानेवाली चिड़ियों के भोजन संसाधन इन्हीं जीवो के कारण सर्दी में घट जाते हैं।

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