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कोविड के कारण लॉकडाउन:लॉकडाउन में छूट के बाद भी मजदूरों को नहीं मिल रहा काम, मायूस होकर लौटे

हजारीबाग7 दिन पहले
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काम की तलाश में खड़े मजदूर। - Dainik Bhaskar
काम की तलाश में खड़े मजदूर।
  • निर्माण क्षेत्र में जारी है मंदी का दौर, दूर-दराज से हर दिन काम की खोज में आते हैं शहर, रोजाना आने-जाने में खर्च हो जाता है काफी पैसा

कोविड के कारण लॉकडाउन के बाद धीरे-धीरे सभी क्षेत्रों को अनलॉक किया जा रहा है। दिन में सभी तरह की दुकानें और बाजार खुल रही हैं। निर्माण कार्यों को जारी रखने की छूट दी गई है मगर इसके बावजूद मजदूरों को काम नहीं मिल रहे हैं। वो काम की तलाश में हर दिन लंबी दूरी तय कर शहर आते हैं और फिर काम मिलने की उम्मीद में घंटों इंतजार करते हैं।

संयोग से किसी मजदूर को काम मिला तो मिला अन्यथा इंतजार करने के बाद निराश होकर अपने घरों को लौट जाते हैं। ऐसे में काम नहीं मिलने से मजदूरों में निराशा बढ़ने के साथ ही परिवार को चलाने की चिंता सताने लगी है। रोज कमाने खाने वाले मजदूर काम मिलने की उम्मीद से सुबह सुबह अपने घरों से निकल कर शहर में निर्धारित लेबर अड्डों पर आ गए।

हजारीबाग शहर का कोर्रा चौक मजदूरों का प्रमुख अड्डा है जैसे शहर के अन्य भागों में बड़ी बाजार, पंच मंदिर चौक, इन्द्रपुरी चौक, पगमिल चौक के पास लेबर अड्डा है, जहां प्रतिदिन मजदूर आते हैं और वहां से जिन्हें भी जरूरत होती है, मजदूर बुलाकर ले जाते हैं।

11 बजे तक करते हैं काम का इंतजार
जहां भी काम मिलता है प्राय: नौ बजे तक मजदूर अपने काम में लग जाते हैं। इसलिए मजदूर नौ बजे से पहले लेबर अड्डों पर आ जाते हैं, उसी प्रकार जिन्हें भी काम कराना होता है वे प्राय: नौ बजे के आस पास मजदूरों को बुलाकर ले जाते हैं ताकि निर्धारित समय में मजदूर से अधिक से अधिक काम ले सकें।

मगर इन दिनों मजदूर दिन के 11-11 बजे तक लेबर अड्डों पर इंतजार करते देखे जा रहे हैं। कोर्रा चौक पर बड़ी संख्या में मजदूर काम मिलने की उम्मीद से खड़े थे। उन मजदूरों में महिला मजदूर (रेजा) भी बड़ी संख्या में थी। दिन के 11 बज जाने के बाद भी बड़ी संख्या में खड़े दिखे। इस आस में की देर से भी काम मिल जाय मगर काम लेने वाले भला आधे दिन क्यों काम कराना चाहेगा। हार कर बिना काम किये और बिना कुछ कमाये मजदूर लौटने पर मजबूर दिखे।

कई दिनाें तक नहीं मिलता है काम, हो रही है परेशानी
मजदूरों ने बताया कि लॉकडाउन के बाद से उन्हें भारी कठिनाई से गुजरना पड़ रहा है। कई कई दिनों तक काम नहीं मिलता है जिससे बैठा बैठी में दिन काटनी पड़ रही है। शहर में बहुत कम जगहों पर निर्माण कार्य चल रहा है। कुछ जगहों पर ठेकेदार और ठेका वाले मजदूर पहले से लगे हैं, वैसी जगहों पर उम्मीद नहीं है। नया काम बढ़ नहीं रहा है, जहां काम मिले। फिर भी एक उम्मीद लेकर काम की तलाश में हर दिन शहर आते हैं।

दूसरों से कर्ज लेकर पूरी करते हैं अपनी जरूरतें
घर परिवार की जरुरतों को पूरा करने के लिए उधार, कर्ज लेकर काम चला रहे हैं। कहा कि एक तरह से सभी मजदूरों की यही स्थिति है और सभी कर्ज में डूबते जा रहे हैं। ऊपर से काम करने के लिए भाड़ा खर्च करके शहर आते हैं, काम नहीं मिलने पर यह अलग नुकसान होता है। एक दिन आने जाने में भाड़ा में 40-50 रुपया खर्च हाे जाता है।

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