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  • Nemhus Passed Matriculation Examination From Second Class, Despair In Family At Birth, But Disability Could Not Be A Burden In Front Of Courage

हौसले को सलाम:नेमहस ने द्वितीय श्रेणी से पास की मैट्रिक परीक्षा, जन्म के समय परिवार में थी मायूसी, पर हिम्मत के आगे विकलांगता नहीं बनी पाई बोझ

जारीएक वर्ष पहले
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  • बचपन से दोनों हाथ नहीं थे, दिव्यांगता को अभिशाप नहीं बनने दिया जारी का नेमहस, पैरों से ही लिखना सीखा, मैट्रिक तक पढ़ाई की...
  • अब गरीबी बनी बाधा, सहयोग मिला तो पढ़कर हासिल करेगा ऊंचा मुकाम

जो बहादुर होते हैं, वो समस्याओं से उबर कर निकलना जानते हैं। कुछ ऐसी ही है गुमला जिले के परमवीर अल्बर्ट एक्का की जन्मभूमि जारी प्रखंड में जन्मे नेमहस एक्का जो आधे अधूरे हाथों से दिव्यांग है। बावजूद अपनी दिव्यांगता को उसने अभिशाप बनने नहीं दिया। बल्कि अपनी दिव्यांगता से लड़ते हुए न सिर्फ अपने पैरों से सारे काम निपटाता है। बल्कि पैरों से ही मैट्रिक की परीक्षा लिखकर द्वितीय श्रेणी से उत्तीर्ण हुआ और अब अपने परिवार का सहारा बन कृषि व मवेशी चराने का कार्य करता है।

हालांकि विकलांगता के बावजूद नेमहस तक कोई भी सरकारी सुविधा नहीं मिली है। अपनी गरीबी व मजबूरी के बीच दिव्यांग नेमहस जिंदगी की जंग लड़ रहा है। जानकारी के अनुसार जारी के आमगांव का रहने वाला नेमहस जब पैदा हुआ था। तब उसके दोनों हाथ नहीं थे। नेमहस के पैदा होते ही परिजनों में खुशी की बजाय मायूसी थी कि आखिर नेमहस अपनी जिंदगी कैसे गुजर बसर करेगा। क्योंकि उसके हाथ ही नहीं है। लेकिन नेमहस जब समझदार हुआ, तो उसने कभी अपने दिव्यांगता को बोझ नहीं समझा और अपने घर के सभी काम वह अपने पैरों से ही करता है।

दिव्यांगता के बावजूद पढ़ाई की जिद कर गया स्कूल

जन्म से ही नेमहस दोनों हाथों से अपंग था। इसकी वजह से बचपन से ही उसके हर अरमान टूटने लगे थे। बढ़ती उम्र के साथ ही नेमहस की इच्छा स्कूल जाने की हुई। पर हाथ नहीं होने की वजह से उसके माता-पिता उसे स्कूल नहीं भेज रहे थे। जिसके बाद भी उसने पढ़ने की ठानी और स्कूल जाने की जिद करने लगा। फिर उसके पिता अमर एक्का ने नेमहस को स्कूल भेजना शरू किया। नेमहस स्कूल तो चला गया, लेकिन दोनों हाथ नहीं होने की वजह से पढ़ाई नहीं कर पाता था। दिन भर स्कूल में बैठा रहता था।

फिर एक दिन उसके जेहन में आया कि क्यों ना अपने पैरों का इस्तेमाल हाथ के रूप में करना शुरु किया जाए। इसमें काफी वक्त और हिम्मत लगा। किंतु वह हिम्मत नहीं हारा। बचपन से ही खुद को आत्मनिर्भर बनाने की इच्छा लिए अब नए रास्ते पर निकल पड़ा। जिसमें उसे सफलता मिली और धीरे-धीरे वे अपने सारे कार्य पैरों से ही करने में कामयाब हो गया। साथ ही अथक परिश्रम और अदम्य साहस की बदौलत पढ़ाई करता रहा।

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