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कोरोना वॉरियर ऑटो ड्राइवर:रांची के रवि संक्रमितों को फ्री में हॉस्पिटल पहुंचाते हैं, 7 दिन में 18 लोगों की मदद की

रांची2 महीने पहले

15 अप्रैल को तपती दुपहरी में कोरोना से संक्रमित 55 साल की एक महिला मदद के लिए लोगों के सामने गिड़गिड़ा रही थी। उसे हॉस्पिटल जाना था, लेकिन डर की वजह से कोई मदद के लिए तैयार नहीं था। 21 साल के रवि का दिल महिला की हालत देखकर पसीज गया। रवि ने उन्हें हॉस्पिटल पहुंचाया। इस घटना ने रवि को एक मकसद दे दिया। अब वे कोरोना संक्रमितों को मुफ्त में हॉस्पिटल छोड़ते हैं, ताकि उन्हें समय से इलाज मिल सके।

दूसरे राज्यों की तरह झारखंड भी कोरोना की दूसरी लहर से जूझ रहा है। यहां अप्रैल में ही एक दिन में मिलने वाले नए मरीज 10 गुना से ज्यादा बढ़ गए हैं। इस वजह से सरकार ने यहां एक हफ्ते का लॉकडाउन लगा दिया है। इस वक्त लोग जहां घरों में कैद हैं, वहीं मरीज और उनके परिवार सड़कों पर परेशान घूम रहे हैं। ऐसे हालात में भी रांची के रवि खुद की परवाह किए बिना संक्रमितों की मदद करने में जुटे हैं।

रवि ने अपना मोबाइल नंबर ऑटो पर चिपका रखा है, ताकि लोग को उन तक पहुंचने में मुश्किल न हो ।
रवि ने अपना मोबाइल नंबर ऑटो पर चिपका रखा है, ताकि लोग को उन तक पहुंचने में मुश्किल न हो ।

ऑटो पर चिपकाया अपना मोबाइल नंबर
21 साल के रवि ऑटो चलाते हैं। वह रांची के रामलखन सिंह कॉलेज में बीकॉम थर्ड इयर के स्टूडेंट हैं। रवि का कहना है कि अगर मेरी थोड़ी सी कोशिश से किसी की जान बच सकती है तो इस कोशिश को करने से पीछे क्यों भागना?

रवि ने अपना मोबाइल नंबर ऑटो पर चिपकाने के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी शेयर किया है। लोगों के मदद के लिए वह हमेशा तैयार हैं। 7 दिन में उन्होंने 18 मरीजों को अस्पताल पहुंचाया है। इनमें से कुछ लोगों ने तो उन्हें देर रात में कॉल कर मदद मांगी। इसके बावजूद रवि ने किसी को इनकार नहीं किया।

घरवाले सुरक्षित रहें, इसलिए रात में घर जाते हैं
रवि ने बताया कि उनके घर वालों को चिंता होती है कि अगर वह संक्रमित हो जाएगा तो क्या होगा? परिवार को को परेशानी न हो, किसी तक संक्रमण न पहुंचे इसे ध्यान में रखते हुए वह सुबह निकलने के बाद सीधे रात में घर जाते हैं।

ऑटो चलाकर घर और अखबार बेचकर पढ़ाई का खर्च निकालते हैं
रवि बताते हैं कि वे ऑटो चलाने के साथ-साथ सुबह अखबार बेचने का काम करता हैं। ऑटो से होने वाली कमाई से उनके घर का खर्च चलता है। जबकि, अपनी पढ़ाई पर होने वाला खर्च वे अखबार बेचकर या दूसरे जरिए से कमाते हैं।

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