भास्कर पड़ताल:एजी की आपत्ति के बावजूद 400 करोड़ का निर्माण फंसा पड़ा; इनमें 200 करोड़ के भवन बन कर भी बेकार

रांची21 दिन पहलेलेखक: पवन कुमार
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न्यूरो वाॅर्ड में जमीन पर इलाज - Dainik Bhaskar
न्यूरो वाॅर्ड में जमीन पर इलाज

रिम्स में डॉक्टरों के 322 में से 85 पद खाली हैं। नर्सें भी 846 की जगह 469 ही हैं। रिम्स में 8 अल्ट्रासाउंड मशीनें होनी चाहिए, जबकि हैं सिर्फ दो और वे भी खराब। ईईजी, इंडोस्कोपी, मेमोग्राफी, सीसीटी एबडॉमन और एनटीसीसीपी जैसी मूलभूत जांचों की सुविधा तक नहीं है, लेकिन रिम्स प्रबंधन भवन निर्माण में लगा हुआ है। यहां लगातार भवन बनवाए गए पर समय पर काम पूरा नहीं किया, जिसके चलते योजनाओं की लागत बढ़ती गई। जो भवन पूरे हुए, उनका भी उपयोग नहीं हुआ।

2014 से रिम्स में 400 करोड़ रु. की लागत से जारी भवन निर्माण पर एजी की ऑडिट टीम 2018-19 में आपत्ति जता चुकी है। वे आपत्तियां तो दूर नहीं हुईं पर फिर से 1200 करोड़ रु. का डेवलपमेंट प्लान तैयार हो रहा है। इसके तहत कई भवनों का जीर्णोद्धार और 4 नई इमारत बनाने की योजना है। भास्कर ने पड़ताल की तो पता चला कि पहले से 200 करोड़ के भवन बनकर बेकार पड़े हैं, क्योंकि इन्हें चलाने के लिए पर्याप्त स्टाफ व मशीनें नहीं हैं। काम में देरी के चलते 3 बिल्डिंगों की लागत 145 करोड़ से बढ़कर 191 करोड़ पहुंच चुकी है।

आपत्ति...एस्टीमेट पर एजी की

मई 2016 में 56.99 करोड़ के 5 भवनों के लिए 25.88 करोड़ का रिवाइज्ड एस्टीमेट बना। इस पर रिम्स ने जांच बैठाई, पर जीबी में पास कर दिया। हालांकि समय से भवन नहीं बनने पर एजी ने कहा कि एस्टीमेट बढ़ाने से भी समय पर भवन नहीं बनेंगे। भविष्य में लागत बढ़ेगी व सरकारी राशि की हानि होगी।

अनियमितता पर सचिव की

पिछले वर्ष योजना सचिव ने स्वास्थ्य विभाग में इंजीनियर, ठेकेदार और अधिकारियों की साठ-गांठ से रिवाइज्ड एस्टीमेट के प्रस्ताव पर सवाल उठाए थे। उन्होंने विभाग से पूछा था कि समय पर काम नहीं होने के बावजूद तीन साल बाद रिवाइज्ड एस्टीमेट बनाकर मंजूरी के लिए क्यों भेजा गया। ऐसा प्रस्ताव समझ से परे है।

ट्रॉमा सेंटर चालू नहीं
ट्रॉमा सेंटर चालू नहीं

देरी होने पर एमसीआई की

एकेडमिक ब्लॉक निर्माणाधीन है। इसमें रिम्स की लाइब्रेरी समेत मेडिकल स्टूडेंट्स के कई काम होने हैं। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) लाइब्रेरी खुलने में देरी पर बार-बार सचेत कर चुका है, पर रिम्स प्रबंधन अभी भी लापरवाह बना हुआ है। इस ब्लॉक में लेक्चर थियेटर, कैफेटेरिया भी बनने हैं।

7 सालों से बन रहा रिम्स में देश का 12वां नेत्र संस्थान : इसे 24 माह में बनना था। इस बिल्डिंग की लागत 36.27 करोड़ थी, जो 60 करोड़ रुपए हो गई है। 37.40 करोड़ रुपए भुगतान भी हो गया है। दो साल पीछे चल रहा एकेडमिक ब्लॉक: इसकी लागत 42 करोड़ रुपए है।

इसे 2018-19 में ही बन जाना था, पर अधूरा पड़ा है।500-500 बेड के हॉस्टल में 22 करोड़ का बजट बढ़ा: गर्ल्स और ब्वॉयज हॉस्टल की लागत पहले 67 करोड़ रुपए थी, जो 89 करोड़ हो चुकी है। अभी तक 85% काम पूरा हुआ है। इसे 2016-17 में ही बनकर तैयार हो जाना था।बने हुए भवनों का उपयोग नहीं हो रहा: 15 करोड़ की 4 मंजिला मल्टीलेवल पार्किंग में कोई कार नहीं लगती। 25 करोड़ से बने 100 बेड केे पेइंग वार्ड में मुश्किल से 8-10 मरीज ही भर्ती रहते हैं।

रिम्स निदेशक से सीधी बात

खाली भवनों के उपयोग की हो रही प्लानिंग : डाॅ. प्रसाद

सुपर स्पेशियलिटी विंग सहित कई भवन खाली, फिर भी नए निर्माण की तैयारी?
-खाली भवनों को इस्तेमाल में लाने की दिशा में काम हाे रहा है। पुराने भवनाें का किस तरह उपयाेग हाे, इसकी प्लानिंग भी चल रही है।
सवाल : उपकरण औरमैनपावर की भी कमी है। इसके लिए क्या हो रहा? -पैथाेलाॅजिकल जांच ठीक हुई है। नया सेंट्रल लैब फंक्शनल हाे गया है। सीटी स्कैन मशीन शुरू हाे गई है। छह माह में व्यवस्था और बेहतर हाेगी।

जानिए...1200 करोड़ रुपए के प्लान में क्या-क्या होगा

करीब 1200 करोड़ के री-डेवलपमेंट प्लान के मुताबिक पुरानी बिल्डिंग के जीर्णोद्धार के अलावा चार नए भवन बनेंगे। नए भवनों में 1250 बेड का आईपीडी, ओपीडी कांप्लेक्स, एमसीएच बिल्डिंग और सुपरस्पेशलिटी बिल्डिंग बनाने का प्रस्ताव है।