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गांव से ओलिंपिक तक का सफर:झारखंड की जमीन से ओलिंपिक के मैदान तक पहुंचने वाली बेटियों के गांव से भास्कर ग्राउंड रिपोर्ट

रांची2 महीने पहलेलेखक: रंजीत प्रसाद, नरेंद्र अग्रवाल और संदीप कुमार
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निक्की प्रधान और सलीमा - Dainik Bhaskar
निक्की प्रधान और सलीमा
  • निक्की प्रधान के गांव हेसेल में हॉकी ने बदला नजरिया
  • सलीमा टेटे का गांव बड़कीछापर भी सुर्खियों में

खूंटी और सिमडेगा की दाे बेटियां इन दिनाें चर्चा में हैं। बांस के डंडे से खेल का सफर शुरू करने वाली दाेनाें बेटियाें ने अंतर्राष्टीय हाॅकी में झारखंड का नाम बुलंद किया है। खूंटी की निक्की प्रधान लगातार दूसरी बार भारतीय हाॅकी टीम से ओलिंपिंक खेलेंगी ताे सिमडेगा की सलीमा टेटे ने पहली बार क्वालिफाई किया है। ये दाेनाें अब टाेक्याे ओलिंपिक में खेलेंगी।

इस गांव में लड़कियाें के खेलने पर पाबंदी थी, उसी ने दिए 26 राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी

निक्की प्रधान के माता-पिता घर के बाहर काम करते।
निक्की प्रधान के माता-पिता घर के बाहर काम करते।

60 परिवार और 300 की आबादी वाला हेसेल खूंटी जिले का ऐसा गांव है, जहां से 26 राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और स्टेट लेवल महिला खिलाड़ी निकली हैं। इनमें से 13 खिलाड़ी अपने खेल की बदाैलत सरकारी नौकरी में है। इन्हीं में एक है निक्की प्रधान, जाे ओलंपिक खेलनेवाली झारखंड की पहली महिला खिलाड़ी हैं। राजकीय उत्क्रमित उच्च विद्यालय पेलौल के पूर्व शिक्षक व हाॅकी कोच दशरथ महतो ने बताया कि छाेटे से इस गांव की 73 लड़कियां और 13 लड़के खेल मैदान में अपना जौहर दिखा रहे हैं।

हेसेल में पहले लड़कियाें के खेल पर पाबंदी थी। समाज में इसे अच्छा नहीं माना जाता था। 20-22 साल पहले जब वहां लड़कियाें ने हाॅकी खेलना शुरू किया ताे गांव के लाेग कहते थे कि लड़कियां खेलेंगी ताे बिगड़ जाएंगी। बेटियाें से कौन शादी करेगा। काेच दशरथ महताे काे भी ग्रामीणाें का विराेध झेलना पड़ा। उन्हें खेल बंद करने की धमकी दी गई। एक दिन जब उसी गांव की बेटी पुष्पा प्रधान भारतीय हाॅकी टीम से न्यू जर्सी अमेरिका में भारत का प्रतिनिधित्व कर गांव लौटी तो सबका नजरिया बदल गया।

गांव के उबड़-खाबड़ मैदान में बांस की स्टिक से खेल सलीमा ने बनाया ओलंपिक का रास्ता

ढह रहा सलीमा के घर का एक हिस्सा।
ढह रहा सलीमा के घर का एक हिस्सा।

सिमडेगा के करीब 600 आबादी वाले बड़कीछापर गांव इन सुर्खियाें में है। गांव की बेटी सलीमा टेटे टोक्यो ओलंपिक में भारतीय टीम का हिस्सा बन जलवा दिखाएगी। उसकी छोटी बहन महिमा टेटे भी नेशनल हॉकी प्लेयर है और पिता सुलक्सन टेटे भी राज्यस्तरीय खिलाड़ी रह चुके हैं। अभी बेंगलुरु कैंप में पसीना बहा रही सलीमा 5 साल से अंतराष्ट्रीय मैचों में देश के लिए खेल रही है, लेकिन इस अवधि में न ताे उसके गांव के हालात बदले और ना परिवार के।

पिता सुलक्सन ही सलीमा के पहले कोच हैं। पूरा इलाका उन्हें हाॅकी खेल की वजह से जानता है। उन्हाेंने बताया कि गांव में लड़कियाें के लिए अलग व्यवस्था नहीं है। इसलिए गांव में हॉकी खेलने वाली लड़कियां कम थीं। सलीमा लड़कों के साथ हॉकी खेलती थी। गरीबी के कारण उसके पास अच्छी स्टिक नहीं थी। पिता ही बांस की हाॅकी स्टिक बनाकर देते थे। सलीमा के भाई अनमोल ने भी बहन काे आगे बढ़ाने में मदद की। वह एक होटल में काम करता है।

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