सस्ती दवा की पहल:रांची घूमने आए और तैयार कर दिया 5 गुना तक सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने का अनूठा माॅडल

रांची5 महीने पहले
  • कॉपी लिंक
ट्रस्टी ने कहा... हम सस्ती दवाई बेचकर पैसे नहीं कमाते, बल्कि जरूरत के समय लोगों की सेवा कर खुशियां कमाते हैं। - Dainik Bhaskar
ट्रस्टी ने कहा... हम सस्ती दवाई बेचकर पैसे नहीं कमाते, बल्कि जरूरत के समय लोगों की सेवा कर खुशियां कमाते हैं।
  • ब्रिटिश नागरिक बैराेलिया 7 साल पहले झारखंड आए और प्रेमसंस के साथ शुरू की दवाई दोस्त
  • दवाई दोस्त की दुकानों में प्रसिद्ध वॉकहार्डट कंपनी की इंसुलिन आधी कीमत पर उपलब्ध कराई जा रही है
  • 10 लाख लाेगाें काे रिम्स के दवाई दाेस्त केंद्र से दी सस्ती दवाएं छह साल में
  • 80 हजार मरीजों को हर माह दवा की आपूर्ति दवाई दोस्त से होती थी
  • 02 करोड़ रुपए हर महीने गरीबों के बच जाते थे

आज लाेगाें के आय का एक बड़ा हिस्सा इलाज पर खर्च हाे रहा है। इनमें सबसे अधिक खर्च दवाइयाें पर है। दवाइयाें पर हाेलसेल रेट से दस गुणा तक अधिक एमआरपी लिखी हाेती है। यानी जाे दवा एक रुपए में मिल सकती है, वह दवा लाेगाें काे दस रुपए में खरीदनी पड़ती है। इंडिया मूल के राज बैराेलिया वर्ष 2014 में अपने मित्र पुनित पाेद्दार और पंकज पोद्दार के यहां आए और देखा िक भारत की कंपनियाें की जाे दवाएं बहुतायत में लंदन या अन्य देशाें में काफी सस्ती कीमताें पर बिक रही हैं, वही दवाएं रांची में काफी अधिक कीमत पर बिक रही हैं।

पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट रहे बैराेलिया ने इस पूरी व्यवस्था काे एक झटके में समझ लिया और झारखंड के लाेगाें काे सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने की ठानी। उन्हाेंने पुनित पाेद्दार और पंकज पाेद्दार के साथ मिलकर समाज सेवा के लिए एक ट्रस्ट बनाया, नाम रखा प्रेमसंस एंड बैराेलिया ट्रस्ट और काम शुरू कर दिया। शुरुआत में कई दिक्कतें हुईं पर प्रेमसंस के सहयाेग से समस्याओं का निदान हाेता गया और अपर बाजार के नार्थ मार्केट रोड के पुनित पोद्दार व पंकज पोद्दार के पुस्तैनी स्थान से प्रेम कुमार पोद्दार और रुकमानंद बैराेलिया की स्मृति में शुरू हुए दवाई दाेस्त के अब रांची में 18 सेंटर हैं। यहां लाेगाें काे सस्ती दवाइयां मिलती हैं। पर सबसे सस्ती दवाएं रिम्स में मिलती थीं। अत्यधिक जरूरतमंदाें काे ताे नि:शुल्क दवाएं दी जाती थीं। इन सेंटराें के दर्जन भर से ज्यादा स्टाफ सिस्टम काे समझकर अपनी दुकानें भी खाेल रहे हैं और लाेगाें काे सस्ती दवाएं उपलब्ध करा रहे हैं।

10 लाख से अधिक लाेगाें काे सस्ती दवाएं उपलब्ध कराए

पिछले सात साल में केवल रिम्स के दवाई दाेस्त केंद्र से दस लाख से अधिक लाेगाें काे सस्ती दवाएं उपलब्ध कराई गई हैं, पिछले साल रिम्स में गरीबांे के आठ करोड़ रुपए की बचत हुई। दवाओं के खर्च पर बचत कैसे हाेती है, इसका अंदाजा आप कुछ उदाहरणाें से समझें। काेराेना काल में सस्ती वाली मास्क भी दस रुपए में बिक रही थी, पर दवाई दाेस्त केंद्र में एक रुपए सत्तर पैसे में उपलब्ध थी। इसी प्रकार कुछ और दवाएं देखें,पेंटाप्राेजाेल टैबलेट इसकी एमआरपी है 104.37 रु जबकि दवाई दाेस्त ने इसे 7.52 रु में उपलब्ध कराया। सिफ्यूराेक्सिम की एमआरपी 438 रु है, जो रिम्स में 70.92 रुपए में उपलब्ध थी। एेसी ही 1200 तरह की दवाएं रिम्स के दवाई दोस्त ने गरीबाें काे उपलब्ध कराईं। झारखंड के इस सक्सेस माॅडल काे सराहा जा रहा है।

यह बिजनेस नहीं, जाॅय ऑफ गिविंग है

दवाई दाेस्त के ट्रस्टी पुनित पाेद्दार बताते हैं कि राज बैराेलिया लंदन के नागरिक हैं, प्राेफेशनल हैं, मेरा और मेरे भाई पंकज पाेद्दार के कई व्यवसाय हैं, पर सामाजिक जिम्मेवारी के तहत हम कुछ बड़ा करना चाहते थे, कुछ ऐसा जिससे अधिक से अधिक लाेगाें काे लाभ मिले। बैराेलिया यहां आए ताे सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने का प्लान बना और दवाई दाेस्त इसका परिणाम है। बहुत लाेगाें काे इस बात की जानकारी नहीं कि दवाई दाेस्त का संचालन ट्रस्ट से हाेता है। इसमें हम मुनाफा ताे दूर काफी पैसा अपना लगाते हैं। इस काम में अत्यधिक समय और मेहनत लगता है, पर इससे हम गरीबाें के चेहरे पर खुशियां लाते हैं। यही इस काम की कमाई है। पुनित पाेद्दार कहते हैं कि सस्ती दवाइयां देकर मुनाफा कैसे हाेगा।

इस माॅडल काे पूरे राज्य में अपनाया जाना चाहिए

ट्रस्टी पंकज पाेद्दार बताते हैं कि शुरू में हमें भी संदेह था कि लाेगाें काे कैसे सस्ती दवाइयां मिल सकती हैं। जब जन ओषधि केंद्र यह नहीं कर पा रहा ताे शायद यह संभव नहीं है। पर शुरुआती मुश्किलाें के बाद जब एक माॅडल खड़ा हाे गया और रिम्स में 24 घंटे मरीजाें की भीड़ दवा लेने के लिए उमड़ने लगी, ताे हमारा भराेसा बढ़ा। अब लगता है कि सरकार चाहे ताे पूरे राज्य में इस माॅडल काे खड़ा कर सकती है, लाेगाें काे सस्ती दवाएं उपलब्ध करा सकती है। लाेगाें काे सस्ती दवाएं भी मिलेंगी और बड़ी संख्या में लाेगाें काे राेजगार भी मिलेगा। बड़ी संख्या में लड़कियों को इन दुकानों में रोजगार मिला है। सिस्टम समझकर लाेग गांव-गांव में अपनी दुकानें भी खाेल सकते हैं।

पूरे देश के लिए नजीर हाे सकता है दवाई दाेस्त

ब्रिटिश नागरिक और दवाई दाेस्त के ट्रस्टी राज बैराेलिया बताते हैं कि सरकार चाहे ताे हर गरीब काे आसानी से सस्ती दवाएं मिल सकती हैं। पर देश में मेडिसिन की एक अलग और बहुत मजबूत सप्लाई चेन है। सालाें से इसकी अपनी व्यवस्था चली आ रही है। संभव है कई लाेग उस व्यवस्था काे बरकरार रखना चाहते हाें, इसलिए हमारे देश में गरीबाें काे सस्ती दवाएं नहीं मिल पा रहीं,नहीं ताे इसमें काेई राॅकेट साइंस नहीं है। हमारा ट्रस्ट रांची के सप्लायर से ही दवाएं खरीदता है और इसे लाेगाें के बीच सस्ती दरों पर बेचता है। समस्या यह है कि जेनरिक दवाओं के हाेलसेल प्राइस और रिटेल प्राइस में जमीन-आसमान का अंतर है। कंपनियां सस्ती दवाएं ही बाजार में दे रही हैं, पर बीच की चेन के कारण आम लाेगाें तक पहुंचते-पहुंचते यह कई गुना महंगी हाे जा रही हैं।

खबरें और भी हैं...