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कोरोना की हार:प्रकृति के करीब और कंद-मूल भोजन, इसलिए 16 गांव में कोई संक्रमित नहीं, तीन हजार आबादी को छू नहीं पाया कोरोना

लातेहारएक महीने पहले
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  • लातेहार के परहिया समुदाय में भी टाना भगतों जैसी कहानी

लातेहार में परहिया समुदाय ऐसी जनजाति है, जिनके डर से काेराेना महामारी भी दूर भागती है। प्रकृति के करीब रहने वाले इस समुदाय की कहानी भी टाना भगताें से मिलती-जुलती है। इनका मुख्य आहार कंद-मूल है और ये तुलसी-गुड़ का पेय पीते हैं। झारखंड में काेराेना ने करीब एक लाख लाेगाें काे अपनी चपेट में लिया, लेकिन खान-पान और रहन-सहन के कारण विलुप्त हाेती इस जनजाति के एक भी व्यक्ति काे महामारी छू भी नहीं सकी। लातेहार जिले के 9 प्रखंडाें के चेटुआग, लटदाग, दामोदर, सरलाही, कोने, बिनगड़ा, हेन्देहास, बैगाटोली, नावाडीह, चुड़रवाटोली, पकरी, झाबर, हुर, खीराखांड़, तेवरही और उचवाबाल 16 गांवों में आदिम जनजाति परहिया समुदाय की तीन हजार से ज्यादा आबादी रहती है।

कोरोना संक्रमण के दौर में चौंकाने वाला सच यह है कि पहाड़ की तलहटी में रहने वाली इस जनजाति के एक भी सदस्य तक बीमारी पहुंच नहीं पाई। बीमार हाेने की स्थिति में भी ये अस्पताल नहीं जाते, बल्कि जड़ी-बूटी से ही इलाज करते हैं। गांव वालों का कहना है कि कड़ी मेहनत, स्वच्छता, शुद्ध व गर्म आहार और जड़ी-बूटी ही उनके जीवन का आधार है। इस कारण किसी को काेराेना नहीं हुआ। डाॅ. एस सागर के अनुसार, परहिया समुदाय के लोग बचपन से ही तुलसी, आंवला, कुसुम जैसी औषधियाें का इस्तेमाल करते हैं। इन औषधियाें के उपयाेग और शुद्ध आहार से इनकी प्रतिराेधक क्षमता बढ़ जाती है, जाे किसी भी बीमारी काे राेकने में सहयाेग करती है। सागर कहते हैं कि पिछली जनगणना के अनुसार राज्य में 86 लाख जनजातीय आबादी है। इनमें से ज्यादातर आबादी गांव-जंगलों में रहती है। इसलिए प्रकृति के करीब है।

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