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हारिए मत, कोरोनाकाल को हराइए:इन्होंने आत्महत्या के ख्याल और कोशिशों के बाद अपने जीवन को 360 डिग्री बदला, अब कामयाबी की मिसाल

रांचीएक महीने पहले
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4 प्रेरणादायक कहानियां...जीवन से निराश कुछ लोग उस मोड़ पर पहुंच गए, जहां से उन्हें सिर्फ जिंदगी का अंत नजर आ रहा था। उन्होंने जीवन खत्म करने का मन भी बना लिया, पर नकारात्मकता से धीरे-धीरे उबरीं और इसे ही अपनी शक्ति बना ली। आज कामयाबी की मिसाल हैं। इनमें दो कहानियां दो बहादुरों ने सोशल मीडिया पर खुद दैनिक भास्कर से शेयर किया। बुलंदी से कहा- हमारी आवाज मायूस बैठे लोगों को हौसला देगी...

लॉकडाउन ने तनाव बढ़ाया जान देने की सोची, पर इसी अनुभव पर लिख डाली किताब

रांची की 19 वर्षीय आयुक्ता जिशा हंसमुख थी। अचानक लॉकडाउन के बाद घर पर अकेली रहने और सुशांत सिंह राजपूत की मौत की खबर से डिप्रेस हो गई। पहले तो घरवालों ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। फिर मां- पिता ने स्वभाव में बदलाव देखा। डॉक्टर को दिखाया, खास फायदा नहीं होने पर साइकैट्रिस्ट से सलाह ली। दो महीनों में जिशा न सिर्फ डिप्रेशन से उबर गई, बल्कि अपनी क्रिएटिविटी से किताब भी लिख डाली ‘सिनड्रेला इन स्लिपर्स’। आयुक्ता संत जेवियर्स काॅलेज से इंग्लिश आनर्स कर रही है। कहती है- लॉकडाउन में लगता था कहीं से कूद जाऊं, पर पैरेंट्स ने साथ दिया। मैंने लेखन को डिप्रेशन दूर करने का जरिया बनाया। मां की सलाह पर उपन्यास लिखना शुरू किया। इस दौरान धीरे-धीरे डिप्रेशन दूर जाने लगा और अब जीवन बदल गया है।

रैगिंग से आत्महत्या तक पहुंच गईं, बिरजू महाराज की शिष्या बन आज डांस टीचर

अब स्पेशल बच्चों को दीपशिखा में डांस सिखा रही हूं
अब स्पेशल बच्चों को दीपशिखा में डांस सिखा रही हूं

रांची की शुभम च्यवन कहती हैं कि 2014 में सुसाइडल टेंडेंसी काफी बढ़ गई, लेकिन कभी आत्महत्या करने में सफल नहीं हुई। 2006 में इलाज के बाद ठीक हो गईं। 2014 में मोहाली निफ्ट में सलेक्शन हुआ। पर वहां रैगिंग से फिर तबीयत खराब हो गई। कोर्स छोड़कर लौटना पड़ा। दिल्ली में फिर लंबा ट्रीटमेंट चला। मुझे नृत्य का भी शौक था। बचपन से ही कथक सीखा था। मैंने बिरजू महाराज का कलाश्रम ज्वॉइन किया और उनके शिष्य राघव शाह से कथक सीखा। बिरजू महाराज के साथ भी कई शो किए। उससे मेरे अंदर एक नई ऊर्जा आई। 2017 में मैं माता-पिता के पास रांची आ गई। आने के बाद रांची में यहां एक डांस इंस्टीट्यूट में बच्चों को डांस सिखाने लगीं। फिर अपनी डांस एकेडमी खोली। अब स्पेशल बच्चों को दीपशिखा में डांस सिखा रही हूं।

दिव्यांगता के ताने से 4 बार आत्महत्या का प्रयास किया, अब छात्रों में भर रहे हौसला

हर बच्चे से यही कहता हूं कि कभी खुद से हताश नहीं हो
हर बच्चे से यही कहता हूं कि कभी खुद से हताश नहीं हो

पोलियोग्रस्त होने से शादी नहीं हो रही थी। दो छोटे भाइयों ने लव मैरेज कर ली थी। शादी नहीं होने पर घर वाले ताना मारते थे। 1992 में पहली बार मैंने धुर्वा डैम में छलांग लगा दी। लेकिन वहां पानी खोलने वाले कर्मचारियों ने बचा लिया। 1993 में पंखे से लटकने की कोशिश की, पर बच गया। कुछ ही महीनों बाद फिर हाथ की नस काट ली। चौथी बार 1994 में नींद की काफी गोली खा ली, लेकिन उसके बाद भी बच गया। लेकिन भगवान को कुछ और ही मंजूर था। 2002 में एक गरीब परिवार में शादी हुई। पत्नी ने पूरी जिंदगी बदल दी। इतना प्रोत्साहित किया कि मैं बढ़ता चला गया। 2013 में प्लस टू स्कूल में नौकरी लग गई। आज मेरे पढ़ाए हुए स्टूडेंट्स अच्छे पोस्ट पर हैं। हर बच्चे से यही कहता हूं कि कभी खुद से हताश नहीं हो।

दो बार मैट्रिक फेल, शादी भी दोनों बार नहीं टिकी, पर बीए-पीजी में टॉपर बनीं

अब मैं अपने बेटों के लिए जीना चाहती हूं
अब मैं अपने बेटों के लिए जीना चाहती हूं

दो बार मैट्रिक में फेल होने पर खुदकुशी करने की कोशिश की। घरवालों ने शादी करा दी। पति पढ़ाना नहीं चाहते थे, पर मैंने पढ़ाई जारी रखी और बीए में कॉलेज टॉप किया। तब तक एक बेटा भी हो गया। पीजी में भी टॉप किया। शादी के सात साल बाद तलाक हो गया। इसके बाद भी पढ़ाई नहीं छोड़ी और पीएचडी किया। मायकों वालों का भी सपोर्ट नहीं मिला। तब प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने लगी और बेटे के साथ अकेली रहने लगी। मन में आता सुसाइड कर लूं। लेकिन बेटे के लिए जीना था। फिर परिचितों के कहने पर दूसरी शादी कर ली। पर आज स्थिति यह है कि पति अलग रहते हैं। तब तक दूसरा बेटा भी हो गया। पर, आखिर कब तक दुख झेलती। 2018 में सरकारी स्कूल में मेरी नौकरी लग गई। अब मैं अपने बेटों के लिए जीना चाहती हूं।

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