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  • If The Tradition Is Broken To Protect The Creatures, Then Evil Is Not There ... Sri Krishna Also Did Not Fight The Enemy Seeing The Situation And Even Called Ranchod

रथयात्रा:प्राणियों की रक्षा के लिए परंपरा टूटे तो बुराई नहीं... श्रीकृष्ण भी परिस्थिति देख शत्रु से नहीं लड़े और रणछोड़ तक कहलाए

रांची2 महीने पहले
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  • 329 वर्ष में पहली बार रांची में टूटी रथयात्रा की परंपरा...
  • भास्कर अपील... कोरोना का संकटकाल है, आप भी श्रीकृष्ण के जीवन से सीख ले खुद को बदलिए

पुरी की रथयात्रा के इतिहास में करीब 144 वर्ष का दौर ऐसा था जब मूर्तिभंजकों के शासन के चलते रथयात्रा समेत सभी प्रकल्प विलुप्त हो गए थे। हालांकि रांची की रथयात्रा के 329 साल के इतिहास में यह पहला मौका है जब रथयात्रा नहीं निकल रही है। परंतु समय की यही मांग है। पूरा विश्व एक ऐसे शत्रु से लड़ रहा है जो अभी हमसे ज्यादा ताकतवर है। कृष्ण भी कहते हैं कि जिस शत्रु से हम लड़ नहीं सकते, उससे दूर रहना (भाग जाना) ही बेहतर है। श्रीकृष्ण के जीवन में एक समय ऐसा भी आया था जब उन्होंने अपने शत्रु से मुकाबला न करके मैदान छोड़ने में ही अपनी भलाई समझी, रणछोड़ बन गए।

यह घटना तब की है जब कंस के ससुर मगधराज जरासंध ने कृष्ण को युद्ध के लिए ललकारा था। जरासंध ने कृष्ण के साथ युद्ध करने के लिए अपने साथ कालयवन नाम के राजा को भी मना लिया। कालयवन को भगवान शंकर ने वरदान दिया था कि न तो चंद्रवंशी और न ही सूर्यवंशी उसका कभी कुछ बिगाड़ पाएंगे। उसे न तो कोई हथियार खरोच सकता है और न ही कोई उसे अपने बल से हरा सकता है। भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि कालयवन को हराया नहीं जा सकता, उनका सुदर्शन चक्र भी उस पर बेअसर होगा। ऐसे में जब कालयवन ने मथुरा पर आक्रमण किया तो वे रणभूमि से भागकर एक गुफा में पहुंच गए।

यह वही गुफा थी जहां राक्षसों से युद्ध करके राजा मुचकुंद त्रेतायुग से सोए हुए थे। राजा मुचकुंद दानवों को हराने के बाद बहुत थक गए थे, जिसके बदले इंद्र ने उन्हें विश्राम का आग्रह कर एक वरदान भी दिया। इंद्र ने कहा कि जो भी इंसान तुम्हें नींद से जगाएगा वो जलकर खाक हो जाएगा। भगवान कृष्ण कालयवन को अपने पीछे भगाते-भगाते उस गुफा तक ले आए और राजा मुचकुंद के ऊपर अपना पीतांबर डाल दिया। कालयवन को लगा श्री कृष्ण उससे डरकर अंधेरी गुफा में सो गए हैं। कालयवन ने जैसे ही त्रेता युग से सोए हुए राजा मुचकुंद को लात मारकर उठाया वह जलकर खाक हो गया। दरअसल भगवान कृष्ण यह जानते थे कि उस समय उनके शत्रु यानी जरासंध की ताकत उनसे कहीं ज्यादा थी। रणछोड़ कर वे यह संदेश देना चाह रहे थे कि दुश्मन का सामना तभी करना चाहिए जब आपको अपने बल पर पूरा यकीन हो। - शेष पेज 7 पर

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