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थाना बना कबाड़खाना:थानों में सड़ गईं 400 करोड़ रुपए की डेढ़ लाख गाड़ियां, थानेदार बोले- अपराध रोकें या गाड़ियां बेचें

रांची2 महीने पहले
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रांची के जगन्नाथपुर थाने में सालों से वाहनों की नीलामी नहीं होने से वाहन बर्बाद हो रहे हैं। यही हाल राज्य के अधिकतर थानों का है।
  • राज्य के 468 थानों में सड़ रहे भारी और हल्के वाहन, नीलामी पर किसी का ध्यान नहीं
  • जब्त वाहनों की नीलामी हो जाए तो सरकारी कोषागार में 200 करोड़ रुपए तक की रकम आएगी

झारखंड के 468 पुलिस थानों में सड़ रहे भारी और हल्के वाहनों की नीलामी पर महकमा का ध्यान ही नहीं है। यहां थाने में खड़े-खड़े 400 करोड़ की गाड़ियां खत्म हो चुकी हैं। इन जब्त गाड़ियों को कबाड़ में भी बेचा जाए तो 200 करोड़ रुपए मिलेंगे। लेकिन पुलिस प्रशासन की लापरवाही के कारण सरकार को खासा नुकसान हो रहा है।

धनबाद के एमवीआई बुद्धिनाथ चौधरी ने बताया कि ज्यादातर गाड़ियों की कंडीशन खराब हो जाती है, जिससे नीलामी में कबाड़ी वाले ही उसे खरीदते हैं। बाइक की औसत कीमत 6 हजार तक और कार की औसत कीमत 30 हजार रुपए तक होती है। इंजन सही रहा तो कबाड़ी वाला उसे निकाल कर बेच देता है, जबकि अन्य पार्ट्स अलग अलग कर वह बेचता है।

यदि इस आधार पर कुल रकम जोड़ी जाए तो दो पहिया वाहन से 59.51 करोड़ और चार पहिया वाहनों से 142 करोड़ रुपए सरकारी ट्रेजरी में आएंगे। वहीं लातेहार के एमवीआई अशोक सिंह ने बताया कि प्रशासन जब्त वाहनों का मूल्य निर्धारण उसके कंडीशन के आधार पर करता है। एक वर्ष पुराने वाहन का दाम 60% लगाया जाता है।

जैसे-जैसे गाड़ी पुरानी होती जाती है, उसका मूल्य 10-10% कम होता जाता है। नीलामी से पहले यह भी जांच की जाती है कि उस गाड़ी का जिला परिवहन विभाग में कोई रेवेन्यू बकाया तो नहीं है। इसके अलावा 18% जीएसटी भी जोड़ा जाता है। उल्लेखनीय है कि नीलामी से आई राशि सरकारी कोषागार (ट्रेजरी) में जमा की जाती है। सरकार उस राशि काे अपने हिसाब से विकास कार्याें में खर्च कर सकती है।

जानिए... 3 कारण जिसकी वजह से थानाें में सड़ रही हैं गाड़ियां

1.मालखाना प्रभार की प्रक्रिया जटिल, सालों भी लग जाते हैं...मालखाना का प्रभार लेने या मिलने की प्रक्रिया भी काफी जटिल है, जिसे पूरा हाेने में सालों लग जाते हैं और थानेदार बदल जाते हैं। रख-रखाव में खर्च के कारण थानेदार जब्त गाड़ियाें का ध्यान नहीं रखते।

2.दुर्घटना केस में महीनों बाद जारी होता है रिलीज ऑर्डर... आपराधिक या दुर्घटना मामले में जब्त वाहन के केस सुलझने में महीनाें लग जाते हैं। इस बीच सही रखाव के अभाव में गाड़ियों पर जंग लग जाता है। स्थिति देख वाहन मालिक रिलीज ऑर्डर के बावजूद उसे नहीं ले जाता।

3.लावारिस की नीलामी छह माह बाद, पर थानेदार रुचि नहीं लेते... लावारिस हालत में बरामद वाहन का दावेदार 6 माह तक थाना नहीं पहंुचता है तो थानेदार एसडीओ से आदेश लेने के बाद नीलामी कर सकता है। कागजी प्रक्रिया जटिल होने के कारण थानेदार रुचि नहीं दिखाते।

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