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  • In 10 Years, 629 Hospitals Were Built In 1897 Crore, But Not Open, Because There Was No Recruitment Of Doctors And Nurses.

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झारखंड में स्वास्थ्य संसाधनों की पड़ताल:10 साल में 1897 करोड़ के 629 अस्पताल बने, पर खुले नहीं, क्योंकि डॉक्टर-नर्सों की भर्ती ही नहीं हुई

रांची11 दिन पहले
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जमशेदपुर के धालभूमगढ़ के पावड़ा नरसिंहगढ़ गांव में 11 साल पूर्व 4.50 करोड़ रुपए से सीएचसी बनाया गया था। आज यह खंडहर में तब्दील हो गया है। - Dainik Bhaskar
जमशेदपुर के धालभूमगढ़ के पावड़ा नरसिंहगढ़ गांव में 11 साल पूर्व 4.50 करोड़ रुपए से सीएचसी बनाया गया था। आज यह खंडहर में तब्दील हो गया है।
  • खुल गए होते तो, कोविड में आज 300 डॉक्टर, 1000 नर्सों व अन्य संसाधनों की कमी से निपटा जा सकता था
  • सिर्फ निर्माण में ही रही रुचि, ठेकेदार-अफसरों के खेल में बनते चले गए भवन

झारखंड में स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर अफसरों ने 10 साल में 1897 करोड़ खर्च कर 629 अस्पताल बनवा दिए, पर डॉक्टरों-नर्सों की नियुक्ति के बिना ये कभी खुले ही नहीं। अब खंडहर बन गए हैं। इनमें 75 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी), 2 अनुमंडलीय अस्पताल, 158 पीएचसी और 394 अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (एपीएचसी) शामिल हैं। क्योंकि पिछली सरकारों ने सिर्फ बिल्डिंग बनाने पर ही ध्यान दिया। स्वास्थ्य भवन के साथ पॉलिटेक्निक कॉलेज, हॉस्टल, कल्याण विभाग के भवन भी बनते रहे। अस्पताल चलाने के लिए डॉक्टर और पारा मेडिकलकर्मी कहां से आएंगे, इसकी योजना नहीं बनाई।

अब कोराेना में मैनपावर की कमी का रोना रोया जा रहा है। बेड-वेंटिलेटर के बाद डाॅक्टर और पारा मेडिकलकर्मियों की कमी को सबसे बड़ी चुनाैती माना जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग के ही आधिकारिक सूत्र बता रहे हैं कि वर्तमान हालात से निपटने के लिए 300-400 डॉक्टर और 1000 नर्सों की जरूरत है। इतना मैनपावर मिले तो हालात काबू में किए जा सकते हैं। आपाधापी में अब स्वास्थ्य विभाग ने मेडिकलकर्मियों की नियुक्ति शुरू की है। बड़ा सवाल है कि हर साल करीब 3000 करोड़ का बजट अस्पताल व स्वास्थ्य भवन बनाने के लिए रखा गया। साल दर साल अस्पताल बनते गए, पर इन्हें चलाने के लिए डॉक्टरों-मेडिकलकर्मियों की नियुक्ति के बारे में क्यों नहीं सोचा गया। नियुक्ति होती तो न अस्पताल खंडहर बनते और न ही अब कोरोना के समय डॉक्टर खोजे जाते।

जानिए... क्यों नहीं हुए डॉक्टर और नर्सें नियुक्त

पिछले दिसंबर में लगभग तीन साल बाद झारखंड में जेपीएससी से डॉक्टरों की नियुक्ति हुई। इससे पहले भी कई बार नियुक्ति के लिए विज्ञापन निकाला गया, पर कम ही डॉक्टरों ने आवेदन दिया। जो नियुक्त हुए, उनमें भी कई छोड़कर चले गए। नर्सों की नियुक्ति का मामला स्थानीय नीति में फंसा रहा। वहीं, ठेकेदारों ने कई बिल्डिंगें हैंडओवर नहीं कीं। सरकारें इन सब पर गंभीरता दिखातीं तो आज यह नौबत नहीं आती।

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