• Hindi News
  • Local
  • Jharkhand
  • Ranchi
  • In The Crisis Of Religion, What Should The Party Do After All, Follow The Mahagathbandhan Religion Or Listen To The Heart

JMM के दिल में द्रौपदी, दिमाग BJP के खिलाफ!:धर्मसंकट में पार्टी, आखिर करे तो क्या करे; महागठबंधन धर्म निभाए या दिल की सुने

रांची5 महीने पहले
  • कॉपी लिंक
द्रौपदी मुर्मू का अभिवादन करते सीएम हेमंत सोरेन - Dainik Bhaskar
द्रौपदी मुर्मू का अभिवादन करते सीएम हेमंत सोरेन

बीजेपी के खिलाफ राज्य में पॉलिटिक्स करने वाली झारखंड मुक्ति मोर्चा के सामने धर्मसंकट की स्थिति पैदा हो गई है। एनडीए की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के चुनाव में खड़े होने की वजह से झामुमो इस डिलेमा में है कि वह राष्ट्रपति चुनाव में बीजेपी के साथ जाए या उसके खिलाफ रहे । हालांकि झामुमो के 'बॉडी लैंग्वेज से यह साफ दिखता है कि वह द्रौपदी मुर्मू के समर्थन में खड़े होने का मन बना चुका है।

रांची में एनडीए के विधायक और सांसदों की बैठक में द्रौपदी मुर्मू का आना और सीएम हेमंत सोरेन का ट्वीट कर उनका स्वागत करना एक इशारा है। वहीं दूसरी तरफ जहां वह सुप्रीमो शिबू सोरेन और सीएम सोरेन का द्रौपदी मुर्मू से मिलना दूसरा इशारा है। जिससे इस बात की पुष्टि होती है कि जेएमएम मुर्मू के समर्थन में खड़ा हो सकता है।

झामुमो फिलहाल राज्य में महागठबंधन का हिस्सा है, फिर भी वह मुर्मू के समर्थन में जा सकता है। इसके पीछे 4 प्रमुख वजह है।

1. जिस वोट बैंक को आधार बनाकर झामुमो बीजेपी के खिलाफ राजनीति कर रहा है, द्रौपदी मुर्मू के साथ जाने की वजह से उसे लगता है कि उसका वह वोट बैंक इंटेक्ट रह सकता है। अगर वह द्रौपदी मुर्मू के खिलाफ गया झामुमो को भय है कि बीजेपी उनके उस वोट बैंक को प्रभावित कर सकती है। एक आंकड़े के अनुसार झारखंड में कुल आबादी का 26.20% आबादी अनुसूचित जनजाति की है। ऐसे में झामुमो फ़िलहाल इतना बड़ा रिस्क लेने के मूड में नहीं है।

2. संताल कनेक्शन भी एक बड़ी वजह माना जा रहा है। द्रौपदी मुर्मू ने अपने भाषण के दौरान कई बार यह कहा है कि उनके पूर्वज झारखंड में रहे हैं। उनकी रगों में भी झारखंड का खून है। यह कहीं ना कहीं संताल परगना इलाके से कनेक्टेड है। वहीं दूसरी तरफ झामुमो सुप्रीमो की जन्मस्थली भले ही रामगढ़ जिले का इलाका हो लेकिन उनकी कर्मस्थली दुमका रही है। साथ ही संताल परगना के इलाके ने ही उन्हें राजनीतिक पहचान दी है। संताल कनेक्शन और मजबूत हो इसके लिए झामुमो का द्रौपदी मुर्मू के साथ खड़ा होना जरूरी माना जा रहा है। बता दें कि फिलहाल झामुमो के गढ़ संथाल परगना में सभी 7 अनुसूचित जनजाति की सीटें उसी के कब्जे में हैं।

3. राज्य की 28 अनुसूचित जनजाति सीटों पर बीजेपी और झामुमो दोनों की पैनी नजर है। खुद को अनुसूचित जनजाति का हिमायती होने का दावा कर बीजेपी ने हाल ही में बिरसा मुंडा विश्वास रैली का आयोजन किया था। 2019 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को महज 2 एसटी सीटों पर विजय मिली। वहीं पांच एसटी लोकसभा सीट में से केवल एक झामुमो के कब्जे में है। यही वजह है कि पार्टी की नजर बाकी की रिजर्व सीटों पर है। झामुमो नहीं चाहता है कि उसकी वोट बैंक में सेंधमारी हो इसलिए द्रौपदी मुर्मू के साथ खड़ा होकर बीजेपी के इस दावे झामुमो गलत साबित करना चाहता है।

4. राज्यपाल रहते हुए द्रौपदी मुर्मू तत्कालीन बीजेपी सरकार के सीएनटी और एसपीटी एक्ट में संशोधन के प्रस्ताव को वापस कर दिया था। तब विपक्ष में रही झामुमो ने इस संशोधन के खिलाफ आवाज भी उठाई थी। इतना ही नहीं तत्कालीन गवर्नर के रूप में द्रौपदी मुर्मू ने ट्राइबल एडवाइजरी कौंसिल को लेकर तत्कालीन सरकार को कड़े दिशा निर्देश दिए थे। इन क़दमों को लेकर भी हेमंत सोरेन और गवर्नर के बीच एक सौहार्दपूर्ण रिश्ता भी बना था।

खबरें और भी हैं...