• Hindi News
  • Local
  • Jharkhand
  • Ranchi
  • It Took 17 Years To Think On Patratu Power Plant, Now Only 60% Work Is Done In Four Years, So Private Power Plant Is Ready

भास्कर इन्वेस्टिगेशन:पतरातू पावर प्लांट पर सोचने में 17 साल लग गए, अब चार साल में 60% ही काम हुआ, इतने में निजी पावर प्लांट तैयार

रांची3 महीने पहलेलेखक: पंकज त्रिपाठी
  • कॉपी लिंक
पतरातू पावर प्लांट - Dainik Bhaskar
पतरातू पावर प्लांट

झारखंड के कोयले से 10 राज्यों में 24 से ज्यादा पावर प्लांट चल रहे हैं। लेकिन हम बिजली के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर हैं। मांग 2600 मेगावाट तक पहुंच गई है। जबकि यहां दो सरकारी पावर प्लांटों से 550 मेगावाट बिजली का ही उत्पादन हो रहा है। दरअसल बिजली किल्लत की सबसे बड़ी वजह अदूरदर्शिता व लेटलतीफी है। पतरातू थर्मल पावर प्लांट की स्थिति शुरू से खराब थी। 840 मेगावाट वाले इस प्लांट से 250-300 मेगावाट का ही उत्पादन हो पाता था।

इसकी जगह नया प्लांट लगाने पर सोचने में ही 17 साल लग गए। 2018 में 4000 मेगावाट का प्लांट लगना शुरू हुआ। पहले चरण में 2400 मेगावाट बिजली का उत्पादन 2022 में शुरू होना था। लेकिन अब तक महज 60% ही काम हुआ है। इसे पूरा होने में करीब ढाई साल और लगेंगे। वहीं निजी कंपनी का गोड्‌डा में 1600 मेगावाट का पावर प्लांट भी 2018 में बनना शुरू हुआ। यह उत्पादन के लिए तैयार है।

सबसे बड़ी वजह...अदूरदर्शिता-लेटलतीफी

1. बार-बार बदलती रही सरकार : बार-बार सरकारें बदलती रहीं। पहली बार 2014 में स्थाई सरकार बनी तो 2017 में पतरातू में नया पावर प्लांट बनाने का फैसला हुआ। काम शुरू हुआ पर अब तक यह लेटलतीफी में फंसी हुई है।

2.पुराना पावर प्लांट बंद: 840 मेगावाट का पुराना पतरातू पावर प्लांट बंद कर दिया गया। उसी जगह पर नया प्लांट बन रहा है। इसके बंद होने से किल्लत बढ़ गई।

3. टेंडर विवाद में फंसा टीटीपीएस : वर्ष 2002 में तत्कालीन ऊर्जा मंत्री लालचंद महतो ने 420 मेगावाट क्षमता वाले तेनुघाट थर्मल पावर स्टेशन का एक्सटेंशन प्रोग्राम बनाया। टेंडर की तैयारी हुई, पर विवाद हो गया। अगले साल सरकार गिर गई और मामला लटक गया।

जानिए...निजी कंपनी ने कैसे मैनेज किया, जिससे काम समय पर पूरा हुआ और पतरातू कहां पिछड़ा

पतरातू पावर प्लांट- पहला फेज 2400 मेगावाट, 11,500 करोड़ लागत, काम शुरू : 2018, प्लांट पूरा होना था: 2022 में

  • कोरोना के कारण मार्च 2020 में एक माह के लिए काम बंद रह। अप्रैल में काम शुरू हुआ, लेकिन मजदूर ही नहीं मिले। शुरुआती छह महीनों में काफी कम मजदूरों के साथ काम हुआ। इससे अप्रैल से जुलाई तक वर्क प्रोग्रेस 30% तक कम हुआ।
  • पतरातू में जिस चीनी कंपनी काे एयर कूल्ड कंडेंसर बनाने का काम दिया गया था, कोरोना के बाद वह आई ही नहीं। छह माह इंतजार के बाद दोबारा टेंडर हुआ। अब मैकेनिकल का फिर से टेंडर होगा। कंडेंसर बनाने में कम से कम डेढ़ साल लगेंगे।
  • पतरातू थर्मल पावर प्लांट के पहले चरण के तैयार होने का लक्ष्य 2022 रखा गया था। काम की धीमी प्रगति को देखते हुए अब पीवीयूएनएल ने मार्च 2024 का टार्गेट तय किया गया है। लेकिन शेष 40% काम पूरा होने में कम से कम ढाई साल लगेंगे।

निजी पावर प्लांट- पहला फेज 1600 मेगावाट, 15,000 करोड़ लागत, काम शुरू : 2018, प्लांट पूरा होना था: 2022 में

  • कोरोना के दौरान मजदूरों की दिक्कत हुई तो प्लांट में ही कॉलोनी और हाॅस्पिटल बनाए गए। कॉन्ट्रैक्टर को इंसेंटिव दिए गए। इससे कॉन्ट्रैक्टर ने मजदूरों की व्यवस्था की। अलग-अलग राज्यों से मजदूरों को बुलाया और वहां काम लगातार चलता रहा।
  • इस पावर प्लांट का काम भी चीनी कंपनी कर रही थी। कंपनी ने कर्मचारियों को सुविधाएं देकर साथ बनाए रखा। कोरोना के बाद कंपनी ने दोगुनी रफ्तार से काम शुरू किया। अधिक खर्च करने का निर्णय लिया। और नतीजा-काम समय पर पूरा हुआ।
  • प्लांट में उत्पादन शुरू करने का टार्गेट मार्च 2022 रखा गया था। तय समय में प्लांट बनकर उत्पादन के लिए तैयार है। बांग्लादेश तक ट्रांसमिशन लाइन बिछानी है। काम तेजी से चल रहा है। इसके पूरा होते ही प्लांट में उत्पादन शुरू हो जाएगा।

2600 मेगावाट की जरूरत और हमारा उत्पादन...

  • 420 मेगावाट तेनुघाट प्लांट से
  • 130 मेगावाट सिकिदरी हाइडल से

पांच साल में 26 हजार करोड़ रुपए की बिजली खरीदनी पड़ी

2016-17 : 5223 करोड़ 2017-18 : 5081 करोड़ 2018-19 : 5216 करोड़ 2019-20 : 4317 करोड़ 2020-21 : 6159 करोड़

नियामक आयोग ने हर बार महंगी बिजली खरीद पर आपत्ति जताई
आयोग वर्ष 2003 से ही निर्देश दे रहा है कि सरकार महंगी बिजली नहीं खरीदे। इसके बावजूद पावर प्लांट नहीं लगे। सरकार पावर प्लांट लगाए तो लोगों को सस्ती बिजली मिलेगी और कमाई भी होगी। -एके मेहता, नियामक आयोग के पूर्व सचिव

खबरें और भी हैं...