झारखंड में 1932 खतियानी फैसला बनेगा आइडेंटिटी क्राइसिस की वजह:आरक्षण का फायदा भी नहीं मिलेगा, खतियानी जिसके पास नहीं कहलाएंगे बाहरी

रांची3 महीने पहले

झारखंड सरकार ने राज्य में स्थानीयता को परिभाषित करने के लिए 1932 के खतियान को आधार बनाने का फैसला किया है । सरकार के इस फैसले के अनुसार वैसे लोग जिनके वंशजों का नाम 1932 के खतियान यानि की जमीन के सर्वे में है वही झारखंड के स्थानीय निवासी कहलाएंगे। ऐसा नहीं है कि इस तरह का फैसला पहली बार लिया गया है । 2002 में तत्कालीन राज्य सरकार ने भी 1932 के खतियान को आधार बनाकर स्थानीयता परिभाषित किया था।

आगे चलकर 5 जजों की संविधान पीठ ने इसे खारिज कर दिया था। अब मौजूदा सरकार ने फिर से इसे उठाया है। इस मुद्दे को विस्तार से समझने के लिए दैनिक भास्कर ने कुछ एक्सपर्ट से बात की है।

प्रश्न: 1932 के खतियान आधारित स्थानीयता से क्या समझा जाए ?

उत्तर: इसका सीधा मतलब यही है कि जिन लोगों के पास 1932 का खतियान होगा या फिर जिनके पूर्वजों का नाम उस खतियान में होगा वही लोग झारखंड के स्थानीय निवासी कहलाएंगे।

प्रश्न : जिनके पास 1932 का खतियान नहीं है लेकिन कई पीढ़ियों से यहां रह रहे हों उनका क्या होगा?

उत्तर: वैसे लोगों के पास एक ऑप्शन है कि स्थानीय ग्राम सभा उनके रहन सहन और संस्कृति के आधार पर उन्हें वेरीफाई कर सकती है। इससे वो यहां के स्थानीय कहला सकेंगे। वहीं इस विषय पर वरिष्ठ पत्रकार आनन्द कुमार कहते हैं कि ऐसी स्थिति में ग्रामसभा के सामने भी वैसे लोगों को पहचानने में परेशानी आ सकती है। उन्होंने कहा कि राज्य के कई इलाके ऐसे हैं जहां 1932 के काफी बाद में जमीन का सर्वे हुआ है वैसे में वहां के लोगों को लेकर क्लियरिटी नहीं है।

प्रश्न : वैसे लोगों का क्या होगा जो यहां चालीस पचास साल से रह रहे हैं और यहीं बस गये हैं ?

उत्तर : इस विषय पर आनंद कहते हैं कि एक तरह से देखा जाए तो वैसे लोगों को पहचान का संकट होगा। सबसे बड़ी बात यह है कि एक तरफ उनके पूर्वज अपना सारा कुछ छोड़कर या फिर बेचकर दूसरे राज्य से माइग्रेट होकर यहां चले आये। अब न तो उनके पास अपनी पुरानी जगह से जुड़ी कोई पहचान बची और अब सरकार के इस फैसले से उन्हें झारखंड में कोई आइडेंटिटी नहीं मिलने वाली ।

प्रश्न : सरकार के इस फैसले का किसको और क्या लाभ होगा ?

उत्तर : सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 85 प्रतिशत आबादी को इस फैसले से सीधा लाभ मिलेगा। इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार शम्भुनाथ चौधरी का मानना है कि इस तरह का फैसला एक तरह से पोलिटिकल नेरेटिव सेट करने की कोशिश है इससे बहुत फर्क नहीं पड़ने वाला है । सबसे बड़ी समस्या यह है की सरकार के इस फैसले के खिलाफ जाने या बोलने वाले झारखंडी विरोधी मानसिकता वाले लोग करार दिए जा सकते हैं।

सबसे बड़ी बात यह है कि इस तरह के फैसलों का मतलब है या तो शिक्षण संस्थानों या फिर नौकरियों में आरक्षण का लाभ मिले लेकिन पीछे पलटकर देखें तो अबतक कितने लोगों को सरकारी नौकरियां मिली हैं या फिर शिक्षण संस्थानों में एडमिशन हुआ है।

उन्होंने कहा कि इससे पहले भी यहां की सरकार ने इस तरह का फैसला लिया था लेकिन वह ख़ारिज हो गया था। कुल मिलाकर देखें तो यह एक राजनीतिक कदम ही है ।

प्रश्न : वैसे इलाके जहां 1932 के बाद जमीन का सर्वे हुए है उनका क्या होगा ?

उत्तर : सरकार के इस फैसले से राज्य के बोकारो, जमशेदपुर, धनबाद और संताल परगना के इलाकों में लम्बे समय से रह रहे लोग प्रभावित होंगे। अगर सिर्फ कोल्हान की बात करें तो वहां लगभग 40 लाख से बड़ी आबादी प्रभावित होगी। चौधरी ने कहा कि उस इलाके में सर्वे सेटेलमेंट 1964, 1965 और 1970 में हुआ था। ऐसे में वहां के लोगों का क्या होगा इसको लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है।

प्रश्न : क्या सरकार के इस फैसले को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है?

उत्तर: चौधरी कहते हैं की राज्य सरकार इस फैसले को पारित करके संविधान की नवमीं अनुसूची में शामिल करने के लिए केंद्र सरकार को भेजने वाली है। उसमें यह होता है की जो विषय नवमीं अनुसूची में चला जाता है। उसे अदालत में चुनौती नहीं दिया जा सकता।

वहीं दूसरी तरफ यह भी देखना होगा कि यहां से पहले भी सरना धर्म कोड और झारखंड विधानसभा की सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजा गया है लेकिन अभी तक कुछ हुआ नहीं है। ऐसे में केंद्र के पास जो चीजे चली जाएगीं फिर तो केंद्र तय करेगा उसको कैसे डील करना है ।

प्रश्न : क्या लगता है सरकार के इस फैसले का विरोध भी होगा?

उत्तर : झारखंड हाई कोर्ट के वकील संगम कुमार कहते हैं कि सरकार के इस फैसले के खिलाफ वैसे लोग जरुर आवाज उठाएंगे जो यहां लम्बे समय से रह रहे हैं। उन्हें आरक्षण का लाभ सिर्फ इसलिए नहीं मिल पाएगा क्योंकि वो खतियानी नहीं है। ऐसे लोग न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे।

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