सुन लो सरकार इस जैवलिन थ्रो चैंपियन की पुकार:खेल के लिए सबकुछ छोड़ा, अब न खाने पैसे हैं और न दवा के, बीमारी से जूझ रही ही मरिया

रांचीएक महीने पहले
जेवलिन थ्रो खिलाड़ी मारिया गोरती खलखो

जेवलिन थ्रो की राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी और लगभग तीन दशक तक अपने जैसे खिलाड़ियों को तैयार करने वाली मारिया गोरती खलखो अब सरकार से भोजन और दवा के लिए गुहार लगा रही हैं। राजधानी के नामकुम इलाके में अपने एक रिश्तेदार के यहाँ पनाह लिए हुए खलखो किशोरावस्था से ही अपने खेल के प्रति समर्पित रही। यहाँ तक की उन्होंने अपना पूरा जीवन अपने खेल को दे दिया और शादी तक नहीं की।

1974 में जब मारिया आठवीं क्लास के विद्यार्थी थी, उसी दौरान जौवलिन मीट में फर्स्ट आकर उन्होंने गोल्ड मेडल हासिल किया था। इतना ही नहीं मरिया ने ऑल इंडिया रूरल समिट में भी जैवलिन थ्रो में गोल्ड मेडल हासिल किया। वहीं 1975 में स्कूल नेशनल मणिपुर में गोल्ड मेडल जीता।

वर्ष 1975 -76 में जालंधर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय जैवलिन मीट प्रतियोगिता में फर्स्ट आकर उन्होंने नया रिकॉर्ड भी बनाया। उनकी जीत का सिलसिला लगातार चलता रहा और उन्होंने 1976-77 में बनारस आयोजित जैवलिन थ्रो में गोल्ड मेडल जीता।

लगभग 30 सालों तक तैयार किए खिलाड़ी, अब कोई पूछने वाला नहीं

इसके बाद 30 उन्होंने साल तक जैवलिन के उभरते खिलाडियों को कोचिंग दिया।1980 से 2018 तक वह प्रशिक्षक रहीं। राज्य के लातेहार जिले के महुआडांड़ स्थित सरकारी ट्रेनिंग सेंटर में मात्र 10 हजार रूपये प्रतिमाह के वेतन पर उन्होंने कोच के रूप में सेवाएं दी। राज्य में कबड्डी के खिलाड़ी प्रवीण सिंह कहते हैं कि सरकार को ऐसे खिलाडियों की सुध लेनी चाहिए जिन्होंने अपना सारा जीवन खेल को समर्पित कर दिया।

फेफड़े की है बीमारी, रिम्स में चला था इलाज

बीमार खलखो
बीमार खलखो

लगभग दो साल पहले उन्हें सांस लेने में दिक्कत आ रही थी उसके बाद उन्हें राजधानी के रिम्स में भर्ती कराया गया था। वहां उनका इलाज भी चला लेकिन उसके बाद अब उनके पास दवाइयां खरीदने के पैसे नहीं हैं। हालाँकि उस दौरान उन्हें सरकार द्वारा प्राथमिक तौर पर आर्थिक मदद भी मिली थी। लेकिन वह नाकाफी रही।

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