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सांप से ज्यादा विषैला झाड़फूक :राज्य में 25 में 3 प्रजातियों के सांप ही जहरीले विषहीन की आड़ में पनपा टोना-टोटका

रांची15 दिन पहले
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29 मई को काेडरमा के मरकच्चाे धुबाडीह में संताेषी देवी काे सांप ने डस लिया था। परिजन झाड़फूंक के चक्कर में लगे रहे। तांत्रिक 36 घंटे तक झाड़फूंक करता रहा, लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका। समय पर अस्पताल ले जाते तो जान बच सकती थी।
  • विषहीन सांप जानलेवा नहीं, इनके दंश का इलाज कर ही ओझा जीतते हैं लोगों का विश्वास...समझदार बनिए सांप काटे तो अस्पताल जाइए
  • अंधविश्वास : 36 घंटे तक ओझा-गुनी में जकड़े रहे, गंवा दी जान
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झारखंड में हर साल 1000 मौतें सांप के काटने से हो जाती है। बीते 81 दिनों में 259 मौतें हो गई, यानी इस अवधि में हर दिन 3 से ज्यादा लोगों ने सर्पदंश से जान गवां दी। कारण... राज्य के प्रखंडस्तरीय अस्पतालों में एंटी वेनम ऑफ स्नेक (एवीएस) नहीं है। सदर अस्पतालों में है तो वहां पीड़ित समय पर पहुंच नहीं पाते। दूरी के कारण अस्पताल पहुंचनेे में देर हो जाती है और पीड़ित दम तोड़ देता है। इससे बचने के लिए पीड़ितों के परिजन झोलाछाप डॉक्टर के पास ले जाते हैं या झाड़फूंक के लिए ओझा-गुनी का सहारा लेते हैं। 

सर्पदंश के कई मामलाें में सांप जहरीले नहीं हाेते। इनके डसने पर माैत नहीं हाेती। ऐसे मामलाें में जान बचने पर लाेग झाड़फूंक का चमत्कार मान लेते हैं और ओझा-गुनी पर विश्वास करने लगते हैं। ग्रामीण इलाकों में फसलों की कटाई और बारिश शुरू होने पर सर्पदंश के अधिकतर मामले आते हैं। इस साल अप्रैल से रुक-रुककर बारिश होती रही है। ऐसे में सर्पदंश के मामले भी बढ़ते गए। 1 अप्रैल से 20 जून तक सांप के काटने से 250 से ज्यादा लोग जान गवां चुके हैं। झारखंड में अप्रैल में 79, मई में 125 और जून में 63 माैतें हुईं। इस अवधि में सबसे ज्यादा 20 लाेगाें ने पलामू में जान गंवाई।

झारखंड में 25 प्रजाति के सांप मिलते हैं। इनमें से केवल तीन ही जहरीले हैं। जहरीले सांपों में गेहूंवन (कोबरा), करैत और सियरचंदा (रसेल वाइपर) हैं।  धामन, डोंड, होरहोरा, सांखड़, कुकरी, बोआ, टिंकलेट, हरा नाग, कैट स्नेक, तेलिया सांप, अजगर, पट्टीदार रेसर, लाल धामन आदि सांप विषहीन हाेते हैं। बारिश शुरू होने पर जमीन की निचली परत में पानी जमा हो जाता है। इनमें रहनेवाले सांप जमीन की ऊपरी सतह की ओर भागते हैं। चूहे, गिरगिट, पक्षियों के अंडे-बच्चे, मेढक और छिपकली सांप के मुख्य भोजन हैं।  सांप चूहे के बिल, दीमक की बांबी, ईंट-पत्थर के ढेर में परभक्षी से बचने के लिए छिपकर रहते हैं। अधिकतर सांप निशाचर हाेते हैं। इंसान से उनका टकराव अक्सर रात में होता है, क्याेंकि भाेजन की तलाश में वे रात में निकलते हैं।

गहरा रही अंधविश्वास की जड़ें...  ओझा-गुनी का चमक रहा धंधा

प्रखंड के अस्पतालाें में सांप डसने की दवा नहीं है। बड़ेे सरकारी अस्पतालाें तक पीड़ित पहुंच नहीं पाते। वहां जाने में खर्च और समय अधिक लगता है। डाॅ. मतीन अहमद खान और डाॅ. स्वराज के मुताबिक, सर्पदंश के 70% मामले गैर जहरीले सांपों के होते हैं। इनके डसने पर माैत नहीं होती। लाेगाें काे सांपाें की जानकारी नहीं हाेती इसलिए वे ओझा-गुनी के पास पहुंच जाते हैं।

कई बार जहरीले सांप भी डसते हैं, लेकिन वे शरीर में जहर नहीं डाल पाते। इसे ड्राई बाइट कहा जाता है और माैत नहीं हाेती, पर लोग समझते हैं कि झाड़फूंक से जान बच गई। ऐसे में लोगों का विश्वास ओझा-गुनी पर बढ़ जाता है और वह पीड़ित परिवार से 2 से 20 हजार रुपए तक ऐंठ लेता है। सांपाें के बारे में अज्ञानता और अंधविश्वास के कारण ठगाें का धंधा चमक रहा है।

सर्पदंश पर एक्सपर्ट बोले...किसी भी हाल में पैदल नहीं चलें, कपड़ा कसकर बांधे, पास के अस्पताल में जाएं

डाॅ प्रभात कुमार के अनुसार, किसी काे सांप ने डस लिया है ताे उसे चलने-फिरने नहीं दें। मूवमेंट से रक्तचाप बढ़ता है और जहर शरीर में फैल जाता है। शरीर के जिस स्थान पर सांप ने काटा हाे वहां कपड़ा या क्रैप बैंडेज कसकर बांधे ताकि रक्त संचार की गति कम हाे जाए। पीड़ित की धड़कन सामान्य रखने के लिए उसे तसल्ली दें कि विषहीन सांप ने काटा है, कुछ नहीं होगा। पास के जिला अस्पताल या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाएं, जहां एंटी वेनम उपलब्ध हो। पीड़ित को किसी भी हाल में पैदल नहीं चलाएं। 

सर्पदंश से माैत का कारण अज्ञानता, डर अंधविश्वास और अस्पताल नहीं जाना

हर सांप विषैले नहीं होते। अक्सर डर से लोगों की मौत हो जाती है। अंधविश्वास भी एक बड़ा कारण है। अधिकतर लोग सांपों के बारे में नहीं जानते और झाड़फूंक पर भरोसा कर लेते हैं। सर्पदंश पर पीड़ित को तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए।-डॉ. केएन सिंह, अधीक्षक,पीएमसीएच,पलामू

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