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कैसे लड़ेंगे ब्लैंक फंगस से?:90% पूरा हो चुका है रिम्स का रीजनल आई इंस्टीट्यूट, 10% चार्ज बढ़ने के बाद काम बंद

रांची9 दिन पहले
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रिजनल आई इंस्टीट्यूट की बिल्डिंग - Dainik Bhaskar
रिजनल आई इंस्टीट्यूट की बिल्डिंग
  • 2014 में 39 करोड़ का बना था डीपीआर, निर्माण में बदलाव से अब 63 करोड़ का हुआ, कई सुविधाएं भी गायब
  • कंस्ट्रक्शन कंपनी को छह मंजिले भवन को कंप्लीट कर हैंडओवर करना है

राज्य के विभिन्न अस्पतालों में हर महीने करीब 10 हजार लोग आंखों की समस्या को लेकर पहुंचते हैं। इनमें 20% यानी करीब 2000 मरीजों को सर्जरी की जरूरत पड़ती है। रिम्स राज्य का एक मात्र ऐसा संस्थान है, जहां सामान्य दिनों में रोजाना 100 मरीज आंख की समस्या लेकर पहुंचते हैं। ऐसे में रीजनल आई इंस्टीट्यूट मरीजों के लिए वरदान साबित होता। रिम्स में बन रहे 6 मंजिले आई इंस्टीट्यूट का निर्माण कार्य 2014 में शुरू हुआ था। लेकिन, 7 साल बाद भी शुरू नहीं हो सका। मरम्मत कार्य प्रभावित होने के पीछे विभाग और रिम्स प्रबंधन का बड़ा योगदान है।

39 करोड़ के डीपीआर वाले भवन का डीपीआर पिछले 7 सालों में बढ़कर करीब 63 करोड़ हो चुका है। कंस्ट्रक्शन कंपनी को कंप्लीट भवन हैंडओवर करना है। इसमें एयर कंडिशनिंग, ऑक्सीजन/गैस पाइपलाइन, बेड, मॉड्यूलर ऑपरेशन थियेटर, इक्विपमेंट आदि शामिल है। कंस्ट्रक्शन कंपनी के अधिकारी रोहित अग्रवाल का कहना है कि फिलहाल निर्माण कार्य रिम्स प्रबंधन की अनदेखी के कारण रुका है। डीपीआर बढ़ने के बाद भवन निर्माण विभाग से तकनीकी स्वीकृति मिल चुकी है। काम शुरू करने के लिए रिम्स प्रबंधन को प्रशासनिक स्वीकृति देनी है। फाइल विभाग से पिछले साल जून में ही रिम्स पहुंच चुका है। लेकिन, 12 महीने बाद भी रिम्स की ओर से अप्रूवल नहीं मिला है। इधर, रिम्स प्रबंधन के अनुसार, 2014 में जब काम शुरू हुआ था, तब 39 करोड़ में ही मॉड्यूलर ओटी समेत कई आधुनिक उपकरण की बात कही गई थी। लेकिन, जब डीपीआर बढ़कर 63 करोड़ किया गया तो इससे भी मॉड्यूलर ओटी के निर्माण में असमर्थता जताई गई।

सात सालों में सात स्थाई व प्रभारी निदेशक, पर शुरू नहीं करा सके

आई इंस्टीट्यूट की आधारशिला 2014 में रखी गई थी। तब डॉ. तुलसी महतो निदेशक थे। मई 2014 में ही डॉ. एसके चौधरी जुलाई 2015 तक निदेशक रहे। इसके बाद डॉ. एस हैदर, डॉ. बीएल शरवाल, डॉ. आरके श्रीवास्तव, डॉ. डीके सिंह और डॉ. मंजू गाड़ी डायरेक्टर रहे। इतने निदेशक के बदलने के बाद भी भवन का निर्माण कार्य पूरा नहीं हुआ।

7 सालों में नहीं बन सका भवन, अब हो रहा जर्जर

जानकारी के अनुसार, साल 2014 में निर्माण कार्य स्वास्थ्य विभाग के अभियंत्रण कोषांग द्वारा शुरू हुआ था। दो साल काम चलने के बाद सभी विभाग के अभियंत्रण कोषांग को झारखंड स्टेट बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन में समाहित कर दिया गया। इसमें करीब डेढ़ साल काम प्रभावित रहा। इसके बाद भवन की प्लानिंग में परिवर्तन और एजेंसी चार्ज 10% बढ़ाने के कारण डीपीआर 20 करोड़ बढ़ गया। इसके बाद काम करीब 90% पूरा हो चुका था। लेकिन, 2019 में काम दोबारा बंद हो गया। जून 2020 में विभाग द्वारा निर्माण कार्य शुरू करने के लिए तकनीकी स्वीकृति मिली। लेकिन, फाइल रिम्स पहुंचने के बाद एक साल से एक विभाग से दूसरे विभाग में टेबल टू टेबल घूम रही है।

गेट में लटका था ताला... बिल्डिंग अंदर से हो रही जर्जर पाइपलाइन जंग खा रही, एसी और उपकरण हुए खराब

दैनिक भास्कर की टीम ने रिम्स कैंपस में बन रहे रीजनल आई इंस्टीट्यूट की पड़ताल की। देखा कि गेट में ताला लटका था और निर्माण कार्य बंद था। ताला खुलवाने के बाद टीम ने भवन के सभी तल्ले पर जाकर स्थिति को देखा। भवन निर्माण का करीब 80% काम पूरा हो चुका है। कमरे में फर्श, पुट्टी आदि का काम अधूरा है। एयर कंडीशनर और पाइपलाइन इंस्टॉल कर कुछ फ्लोर पर छोड़ दिया गया है। पाइपलाइन जंग खा रहे हैं। एसी और अन्य कुछ उपकरण खराब हो चुके हैं। करोड़ों के समान की बर्बादी हो रही है। भवन हैंडओवर के बगैर भीतर से जर्जर हो रहा है। जानकारी लेने पर पता चला कि एसी, पाइपलाइन समेत फर्निशिंग के अन्य काम दो साल पहले शुरू हुए थे। जबकि, डेढ़ साल से काम पूरी तरह बंद है। कंस्ट्रक्शन कंपनी के अधिकारी रोहित अग्रवाल के अनुसार, भवन में 20 प्रतिशत का काम पेंडिंग है। उसमें फॉल सीलिंग, दरवाजे खिड़कियां, बेड, मॉड्यूलर ओटी और हॉस्पिटल इक्विपमेंट का काम बाकी है। लिफ्ट और सीढ़ी के काम भी पूरे हो चुके है।

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