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  • The Poets Of Ranchi Put The Pain Of Migrant Laborers Going Through The Streets In Their Own Words… Empty Stomach, Empty Hands, Body Swollen, Dry Lips… There Are Blisters In The Feet, There Is A Lot Of Wound In The Heart.

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लॉकडाउन:सड़कों से गुजर रहे प्रवासी मजदूरों की पीड़ा को रांची के कवियों ने अपने शब्दों में पिरोया...पेट खाली, हाथ खाली, जिस्म सूजा, सूखे होंठ...पांव में छाले हैं, दिल में जख्म भी भरपूर है

रांची8 महीने पहले
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  • आंसुओं से लिख रहे हैं बेबसी की दास्तां, लग रहा है दर्द की तस्वीर बन जाएंगे हम -अज्म शाकरी

वायरस ने पहले बीमार किया, फिर बीमारी बन गया और अब बेबसी। कोरोना वायरस ऐसे ही देखते-देखते बेबसी बन गया है। यही कारण है कि बेबस मजदूर घर पहुंचने की आस लिए 1687 किमी दूर हैदराबाद से गोड्डा तक पैदल चल पड़े हैं। आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र से जो चलना शुरू किया, छत्तीसगढ़, ओडिशा और कई तो पश्चिम बंगाल होते हुए झारखंड के रास्ते रांची होते हुए अपनी मंजिल तक जा रहे हैं। बेबसी के लम्हें तस्वीरों में कैद हैं। इन्हें शब्द देने के लिए दैनिक भास्कर ने शहर के कुछ रचनाकारों को आमंत्रित किया। ये कविताएं एक मजदूर परिवार का दर्द बयां कर रही हैं…
इस उम्र में मैं घर की दाल-रोटी चलाता हूँ
खिलौनों के लिए मचलते हो,
जिस उम्र में तुम...
उस उम्र में मैं घर की, दाल-रोटी चलाता हूँ...
मुसाफिर हो घूमते हो, अपने शौक की खातिर 
मैं दो पैसे कमाने को, दर बदर घूमता हूँ.....
मजदूर हूं, मैं तो साहिब.... जी कर भी मर जाता हूँ!!!
-साधना सिंह 
रखे नहीं जिन्होंने रोजे, उनके भी रोजे चल रहे हैं 
रोजी-रोटी के लिए अपने घर से दूर हैं
पेट खाली धूप तीक्ष्ण है और पांव नंगे जल रहे हैं 
रखे नहीं जिन्होंने रोजे, उनके भी रोजे चल रहे हैं 
आशाओं की लाश लिए, टूटे हुए विश्वास लिए 
वापस अपने घर जाने को भूखे बच्चे निकल रहे हैं 
उन्होंने कितने शहर बसाए, कितने सारे महल बनाए 
लेकिन, उनको दो रोटी भी देने में हम विफल रहे हैं     
-नीरज नीर
वक्त से लाचार कितना आज हर मजदूर है
रोजी-रोटी के लिए जो अपने घर से दूर है।
पेट खाली, हाथ खाली, जिस्म सूजा, सूखे होंठ
पांव में छाले हैं, दिल में जख्म भी भरपूर हैं।
बेबसी, मजबूरियां, तन्हाइयां, लाचारियां, नंगे पांव राह चलने के लिए मजबूर हैं।
-नेहाल सरैयावी

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