पत्नी की गुहार:मुख्यमंत्री जी पति की जान बचा लीजिए , नहीं तो हम सपरिवार रोड पर भीख मांगने को हो जाएंगे मजबूर

कामडारा2 महीने पहलेलेखक: विजय कच्छप
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बीमार बुधवा उरांव बेड पर पड़ा और पास में उसकी मां और पत्नी परिजन। - Dainik Bhaskar
बीमार बुधवा उरांव बेड पर पड़ा और पास में उसकी मां और पत्नी परिजन।
  • रीढ़ की नस दब जाने से कुुछ भी कर पाने में अक्षम है बुधवा उरांव

असाध्य रोग से ग्रसित हो चुके एक आदिवासी युवक 32 वर्षीय बुधवा उरांव पिछले दो वर्षों से बेड पर पड़े जीवन व मृत्यु के बीच झूल रहा है। भूमिहीन व परिवार की आर्थिक स्थिति दयनीय होने कारण अपनी बीमार मां बिरसी उरांइन,पत्नी सुमित्रा उरांइन और पांच वर्षीय पुत्र आदित्य उरांव के साथ पकरा रेलवे स्टेशन टोली में एक किराए के मकान पर रह रहा है।

वहीं पीड़ित पति , सास व बच्चे की देखरेख करना और भोजन व जरूरत का समान को एक साथ पूरा करना सुमित्रा उरांइन (25) के लिए काफी चुनौती भरा है। कहा कि वक्त रहते सरकार व प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया तो हमारा परिवार एक झटके में ताश के पत्ते की तरह बिखर जाएगा।

सरिता पंचायत के पकरा स्टेशन टोली में विलकन सुरीन के कच्चे मकान में किराए पर रहने वाला बुधवा उरांव भूमिहीन है। वह पकरा में अपनी मां बिरसी उरांइन के साथ काफी दिनों से रहता है। उसका आधार कार्ड, वोटर आईडी व राशनकार्ड भी बन चुका है। वहीं दिहाड़ी मजदूरी कर अपने परिवार का जीविकोपार्जन चला रहा था लेकिन इसी बीच 2019 के अक्टूबर में बुधवा उरांव की अचानक तबीयत खराब हो गई और उठने-बैठने और चलने में असमर्थ हो गया।

आयुष्मान कार्ड होने के बाद भी रिम्स में दवा और जांच पर खर्च हो गए 30 हजार रुपए

बुधवा की पत्नी सुमित्रा उरांइन ने उसे इलाज के लिए 16 अक्टूबर 2019 को रांची रिम्स ले गई थी तो वहां पर चिकित्सकों ने बताया कि रीढ़ की नस दब गई है। लेकिन वहां पर उसे आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद दवा वगैरह खरीदने में घर से करीब 30 हजार रुपए खर्च हो गए। सुमित्रा के मुताबिक वहां पर सिर्फ़ एमआरआई का पैसा नहीं लगा था। जब वहां पर ठीक नहीं हुआ तो चिकित्सकों ने उन्हें दिल्ली ले जाने की सलाह दी।

पैसे की समस्या बताई तो चिकित्सकों ने घर में रखने की सलाह देते हुए बताया कि 6 महीने में ठीक हो जाएगा। लेकिन अब दो साल पूरे हो गए, पर अब तक बुधवा ठीक नहीं हुआ। लगातार दो वर्षों से वह बेड में यूं ही भगवान के भरोसे पड़ा हुआ है। परिवार की दयनीय स्थिति को देखते हुए आसपास के लोग सहानुभूति जताते हुए कुछ सहयोग कर देते हैं। लेकिन अब सवाल यह है कि आसपास के गरीब ग्रामीण भी कब तक उसकी मदद कर सकते हैं।

असाध्य रोग से ग्रसित बुधवा की पत्नी सुमित्रा उरांइन के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यह है कि घर में बीमार पति और सास के साथ ही पांच वर्षीय एक बच्चा का दिनभर देखरेख करना। पत्नी ने सीएम और जिला प्रशासन से गुहार लगाई कि मेरे पति को बचा लीजिए, नहीं तो हम सपरिवार सड़क पर भीख मांगने को विवश हो जाएंगे।

बेंगलुरु ले जाने के लिए भी नहीं हैं पैसे , कैसे कराए इलाज
बीमारी से पीड़ित परिवार की दास्तां की जानकारी मिलने पर सीएचसी के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. तारिक अनवर ने बताया कि रीढ़ की हड्डी की नस दब गई होगी और देश के सबसे बड़े सरकारी नस के अस्पताल बेंगलुरु यदि ले जाया जाये तो मरीज ठीक हो जाएगा। लेकिन सवाल यह उठता है कि परिवार को दो जून की रोटी नहीं मिल रही है वह आखिर बेंगलुरु के अस्पताल कैसे पहुंचेगा और अब आखिरी वक्त में मदद की आस लेकर प्रशासन व सरकार से गुहार लगाई है ।

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