धर्म-कर्म:सनातन का मतलब जो शाश्वत हो, जो अभाव से मुक्त हो

सिसई8 महीने पहले
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  • कुदरा में हो रहे श्रीलक्ष्मीनारायण महायज्ञ के सातवें दिन प्रयागराज से पधारे आचार्य कैलाशजी महाराज ने कहा-

श्रीलक्ष्मीनारायण महायज्ञ, कुदरा सिसई के सप्तम दिवस पर प्रयागराज से पधारे आचार्य कैलाशजी महाराज और वैदिक विद्वानों द्वारा आह्वान किए गए देवताओं का पूजन-पारायण-हवन हुआ। अंत में यज्ञ की पूर्णाहुति का कार्य संपन्न कराया गया। सायंकालीन सत्र में जगदगुरु वनांचल पीठाधीश्वर स्वामी दीनदयालजी महाराज ने कहा कि मनुष्य का एक पर्यायवाची शब्द सनातन भी है। इसका मतलब है कि जिसका अस्तित्व सदा सर्वदा विद्यमान रहे, जिसका कभी अभाव ना हो, जो शाश्वत हो।

गीता में भगवान को भी अर्जुन द्वारा सनातन कह कर पुकारा है, और भगवान ने भी अर्जुन को सनातन कह कर पुकारा है। सनातन जीवात्मा को सनातन परमात्मा से मिलाने वाला जो धर्म है उसे सनातन धर्म कहते हैं। सनातन धर्म में सबका आदर हैं, सबका सम्मान है। हम देवताओं के वाहन के रूप पशु - पक्षियों का सिंह, वृषभ, गरूड़, हंस, मूषक, मयूर का पूजन करते है। हम वृक्षों की भी पूजा करते हैं। तुलसी, बिल्व, आंवला, शमी, पीपल, बरगद आदि का देवरूप में पूजन करते हैं।

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