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मुंबई लोकल में भास्कर का रियलिटी चेक:सुपर स्प्रेडर बनी मुंबई की लाइफ लाइन, कोरोना के बीच भी खचाखच भरे डिब्बे; लोग बोले- जिंदगी के लिए बाहर निकलना जरूरी

मुंबई16 दिन पहलेलेखक: राजेश गाबा

महाराष्ट्र इस वक्त दुनियाभर में कोरोना का हॉटस्पॉट बना हुआ है। संक्रमण के मामले रोज रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं, लेकिन मुंबई में जिंदगी तेज रफ्तार से दौड़ रही है। मुंबई की लोकल ट्रेनें इस दौर में भी खचाखच भरी रहती हैं। स्टेशन में एंट्री के दौरान टेम्परेचर नापने का कोई इंतजाम नहीं है। ये ट्रेनें कोरोना की सुपर स्प्रेडर बन गई हैं। भास्कर रिपोर्टर ने लोकल ट्रेन से दादर से बोरीवली तक का सफर किया। पढ़िए इस सफर की कहानी...

दादर स्टेशन पहुंचने पर यहां आम दिनों की तरह ही भारी भीड़ दिखी। रेलवे स्टेशन के एंट्रेंस पर न तो थर्मल स्कैनिंग का इंतजाम था। न ही कोई इस बात की परवाह कर रहा था कि सोशल डिस्टेंसिंग के साथ खड़ा हुआ जाए। कोरोना का डर लोगों के चेहरे पर तो झलक रहा था, लेकिन काम पर जाने की मजबूरी उन पर भी हावी थी। टिकट काउंटर पर एक लंबी लाइन लगी थी। कोई सोशल डिस्टेंसिंग मेंटेन नहीं कर रहा था। यहां कोई रेलवे स्टाफ या सिक्योरिटी कर्मचारी नहीं था जो लोगों से नियमों का पालन करवाए।

एक व्यक्ति बगैर मास्क लगाए फोन पर बात कर रहा था। उससे जब निवेदन किया कि प्लीज मास्क लगा लीजिए। बहुत रिस्क है सभी के लिए। जवाब मिला कि आप अपना काम करो। हालांकि कुछ और लोगों ने भी मास्क लगाने की बात कही, तब उन जनाब ने मजबूरन मास्क पहना।

एक रेलवे कर्मचारी से पूछा कि यहां सोशल डिस्टेंसिंग मेंटेन कराने के लिए कोई सिक्योरिटी या रेलवे पुलिस नहीं है। कुछ लोग तो मास्क भी नहीं लगा रहे, थर्मल स्कैनिंग भी नहीं हो रही, इस पर कर्मचारी ने कहा कि गार्ड तो है, अभी कहीं गया होगा।

टिकट लेकर आगे बढ़ा तो भीड़ में धक्का-मुक्की के बीच ट्रेन के अंदर पहुंचा। ट्रेन के अंदर डिब्बे का नजारा डराने वाला था। कोई सोशल डिस्टेंसिंग नहीं थी, कोच पूरी तरह खचाखच भरा हुआ था। लोग गेट पर भी लटके हुए थे।

डिब्बे के अंदर पैर रखने की जगह नहीं थी। कोई हिल भी नहीं पा रहा था। ट्रेन में भीड़ देखकर लग ही रहा है कि कोरोना का हॉटस्पॉट बने महाराष्ट्र के लोगों में किस तरह का डर है। दादर से माटूंगा और माहिम के बीच लोग चढ़ते-उतरते रहे। जितने उतरते थे, उससे ज्यादा सवार हो जाते थे। ज्यादातर ने मास्क लगा रखा था। कुछ ऐसे भी थे, जिनके मास्क नाक के नीचे ही थे।

आखिर इस भीड़ की वजह क्या है?

माहिम, बांद्रा, खार, सांता क्रूज, विले पार्ले, अंधेरी, जोगेश्वरी, गोरेगांव, मलाड, कांदिवली से बोरीवली तक के एक घंटे के सफर में लोगों से बातचीत की। सवाल पूछा कि इस तरह संक्रमण के खतरे से भरे सफर की वजह क्या है?

ऑटो ड्राइवर जयेश पाटिल कहने लगे कि कोरोना का डर है, लेकिन पेट भी पालना है। क्या पता, ये सब कब खत्म होगा?

हाउस कीपिंग का काम करने वाले 60 वर्षीय अमोल बोले- प्रभादेवी मुंबई में काम करता हूं और दहिसर में रहता हूं। लोकल ट्रेन से घर जा रहा हूं। कोरोना का डर तो है, लेकिन घर चलाने के लिए काम तो करना ही पड़ेगा। वैक्सीन के बारे में पूछने पर कहते हैं- मैंने वैक्सीन नहीं लगवाई, उससे क्या होगा?

साइकोलॉजी की स्टूडेंट साक्षी देशमुख ने बताया- अभी कॉलेज ऑनलाइन है, लेकिन असाइनमेंट के लिए जाना पड़ता है। घर में बैठे-बैठे भी बोर हो जाते हैं। कोरोना को लेकर डर तो लग रहा है, लेकिन काम भी नहीं रुक सकता।

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