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भंडारा अग्निकांड की आंखों देखी:चश्मदीद ने कहा- बच्चों के शरीर गर्म थे और चेहरा काला, जिंदगी भर रहेगा उन्हें न बचा पाने का अफसोस

भंडारा5 दिन पहलेलेखक: सुमन पांडेय
फोटो महाराष्ट्र के भंडारा के जिला अस्पताल की है। यहां शुक्रवार और शनिवार की दरमियानी रात को आग लग गई थी। इस हादसे में 10 बच्चों की जान गई थी।

महाराष्ट्र में भंडारा के जिला अस्पताल में शुक्रवार-शनिवार की दरमियानी रात हुए हादसे ने सभी को हिला कर रख दिया। अस्पताल के सिक न्यूबॉर्न केयर यूनिट (SNCU) में आग की वजह से 10 नवजात बच्चों की जान चली गई। इनमें कुछ बच्चे ऐसे थे, जिनका जन्म ही एक दिन पहले हुआ था। अस्पताल के सुरक्षाकर्मी गौरव रहपड़े ने भास्कर से इस हादसे की आंखों देखी बयां की।

हम सांस नहीं ले पा रहे थे, बच्चे कहां से लेते
गौरव पिछले 2 साल से अस्पताल में बतौर सुरक्षाकर्मी काम कर रहे हैं। लोगों का घायल होना, जीना या मर जाना गौरव के काम का हिस्सा है। मगर शुक्रवार की देर रात जो हुआ, उसे गौरव की आंखें कभी भुला नहीं सकतीं। गौरव अस्पताल के ग्राउंड फ्लोर पर थे, तभी उन्हें खबर मिली कि न्यू बॉर्न केयर यूनिट में आग लग गई है। भागते हुए गौरव यूनिट तक पहुंचे तो देखा यूनिट में धुआं भरा था। अंदर जाने की कोशिश की, मगर सांस न ले पाने की दिक्कत की वजह से कामयाबी नहीं मिली।

आग की वजह से बिजली कट चुकी थी और पूरे यूनिट में सिर्फ धुआं था। जैसे-तैसे गौरव मौके पर पहुंचे। दरवाजे और खिड़की तोड़कर धुआं बाहर निकलने की जगह बनाई। गौरव ने बताया कि इस दौरान हमें सांस लेने में काफी दिक्कत हो रही थी। ऐसे में वे छोटे बच्चे किस तरह से जिंदगी से जूझ रहे होंगे बयां नहीं कर सकता।

इन छोटे बेड्स में बच्चों को रखा जाता है, ये बेड भी किसी भट्‌टी की तरह तप रहे थे।
इन छोटे बेड्स में बच्चों को रखा जाता है, ये बेड भी किसी भट्‌टी की तरह तप रहे थे।

गौरव ने बताया कि कांच को तोड़कर वह उस जगह पर पहुंचे, जहां बच्चों को रखा गया था। 7 बच्चों के शरीर बुरी तरह से गर्म हो चुके थे। उनकी स्किन पर जलने के निशान थे। गौरव ने अपने साथियों के साथ सभी बच्चों को बाहर निकाला। वह नन्हें शरीर इतने गर्म हो चुके थे, जिन्हें हाथों से महसूस किया जा सकता था। बच्चों के शरीर में कोई हलचल नहीं थी। बड़ी मुश्किल से उन्हें दूसरे वार्ड में शिफ्ट किया गया। मगर इसके बाद गौरव की आंखें जो देखने वाली थी, वह कभी नहीं भुलाया जा सकता।

काले पड़ गए थे मासूमों के चेहरे

तस्वीर भंडारा के जिला अस्पताल की है। आग में झुलसे बच्चों के चेहरे काले पड़ गए थे।
तस्वीर भंडारा के जिला अस्पताल की है। आग में झुलसे बच्चों के चेहरे काले पड़ गए थे।

गौरव ने बताया, 'मैं 10 बच्चों की तरफ बढ़ा। इनमें से 7 के चेहरे बुरी तरह से काले पड़ चुके थे। 3 बच्चों का शरीर पूरी तरह से झुलस चुका था। जैसे-तैसे कपड़ों में लपेट कर उन बच्चों को वहां से हटाया गया और बच्चों के शव परिजनों तक पहुंचाए गए। यह मंजर मैं जिंदगी में कभी नहीं भूलूंगा।' वह मंजर याद कर गौरव की आंखें नम हो जाती हैं। वह कहते हैं कि इस बात का अफसोस हमेशा रहेगा कि अगर कुछ पहले संभलने का वक्त मिलता तो शायद 10 नवजात बच्चों की जान बच जाती।

फायर एक्सटिंग्विशर नहीं कर रहे थे काम

अस्पताल में आपात एंट्री की समस्या के चलते फायर फाइटिंग टीम पिछले छज्जे से चढ़कर अंदर दाखिल हुई थी।
अस्पताल में आपात एंट्री की समस्या के चलते फायर फाइटिंग टीम पिछले छज्जे से चढ़कर अंदर दाखिल हुई थी।

गौरव फायर एक्सटिंग्विशर की तरफ भागे थे, लेकिन उन लाल डिब्बों में अव्यवस्था की जंग ऐसी चढ़ी थी कि ऐन मौके पर फायर एक्सटिंग्विशर ने काम ही नहीं किया। डिब्बों को पटकते रहे, उनके क्लिप को खींचते रहे मगर उसमें से आग बुझाने वाला पाउडर निकला ही नहीं। एक-दो फायर एक्सटिंग्विशर चले तो स्प्रे करते रहे। तब तक फायर ब्रिगेड ने पहुंचकर मोर्चा संभाला। गौरव बताते हैं कि अगर अस्पताल का फायर सिस्टम सही तरीके से काम कर रहा होता तो शायद ऐसा हादसा ना होता।

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