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6 महीने बाद फिर शुरू होगी मोनो रेल:18 अक्टूबर से दोबारा पटरी पर दौड़ेगी मोनो रेल, फिलहाल चेंबूर-वडाला-जैकब सर्कल ट्रैक पर चलेगी

मुंबई13 दिन पहले
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मार्च 2020 से मुंबई में मोनो रेल सेवा बंद चल रही है।
  • रेल फिर से शुरू करने से पहले सरकार ने कोविड-19 को देखते हुए एसओपी जारी की है
  • बिना मास्क के ट्रेन में एंट्री नहीं मिलेगी, अंदर भी सोशल डिस्टेंस के साथ बैठना होगा

लॉकडाउन के बाद मार्च से बंद चल रही देश की पहली मुंबई, मोनो रेल सेवा तकरीबन 6 महीने बाद रविवार यानी 18 अक्टूबर से फिर से शुरू हो रही है। फिलहाल, यह केवल चेंबूर-वडाला-जैकब सर्कल ट्रैक पर चलेगी। इसे फिर से शुरू करने से पहले सरकार ने कोविड-19 को देखते हुए एक एसओपी जारी की है। यात्रियों के लिए 'नो मास्क-नो एंट्री'का स्लोगन दिया गया है।

मोनो रेल में यात्रा के लिए जारी की गई गाइडलाइन

  1. बिना मास्क के यात्रियों की मोनो रेल में एंट्री नहीं होगी। ट्रेन के अन्दर भी सभी यात्रियों को दो गज की दूरी नियम को मानना होगा।
  2. टिकट लेने वाले यात्रियों को अपने मोबाइल पर इंस्टाॅल आरोग्य सेतु पर ग्रीन का सिग्नल दिखाना होगा।
  3. हर यात्री को ट्रेन में एक सीट छोड़कर बैठना होगा।
  4. प्लास्टिक टोकन, पेपर टिकट जारी नहीं किया जाएगा। उनके मोबाइल फोन पर डिजिटल टिकट जारी किया जाएगा।
  5. प्रवेश द्वार पर हर यात्री की स्क्रीनिंग की जाएगी।

फरवरी 2014 में शुरू हुई थी मोनो रेल सेवा
मुंबई महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण (एमएमआरडीए) ने फरवरी 2014 में देश की पहली मोनो रेल सेवा चेंबूर और वडाला डिपो के बीच शुरू की थी। तब यह मोनोरेल 8.8 किलोमीटर का सफर पूरा करती थी। दूसरे चरण में इसे 20 किलोमीटर तक बढ़ाया गया। इस रूट पर सात स्टेशन हैं- वडाला, भक्ति पार्क, मैसूर कॉलोनी, बीपीसीएल, फर्टिलाइजर टाउनशिप, वीएनपी-आरसी मार्ग जंक्शन और चेंबूर पड़ता है।

एक कोच में 20 यात्रियों के बैठने की क्षमता
यह ट्रेन 80 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से सिंगल ट्रैक पर दौड़ती हुए 15 से 20 मिनट में अपना सफर पूरा करती है। मोनो रेल के आसमानी नीले, गुलाबी और हरे रंग के हर कोच में 20 यात्रियों के बैठने की जगह है जबकि अधिकतम 200यात्री पूरी ट्रेन में यात्रा कर सकते हैं।

क्‍या है मोनो रेल?

मानो रेल ऐसी ट्रेन हैं जो कि रेलवे लाइन पर नहीं बल्कि एक बीम के सहारे चलती है और इसके सारे कोच इसी बीम से जुड़े होते हैं। इसका पाथ सड़क मार्च से लगभग 10 फीट या इससे भी अधिक ऊंचाई पर बनाया जाता है, जिससे कि यात्रियों को ट्रैफिक से निजात मिलती है, साथ ही यात्रियों की सुविधा का ख्याल रखा जाता है। इसमें सफर के दौरान दुर्घटना की संभावना भी नहीं रहती है, इसकी रफ्तार भी अन्‍य ट्रेनों और बसों से तेज होती है।

मोनो रेल का इतिहास

दुनिया की पहली मोनो रेल 1820 में रूस के ईवान इलमानोव के द्वारा बेहतर यातायात के विकल्प के तौर पर बनाई गयी थी। जिसके बाद 1821 में इसका पहला ट्रायल दक्षिणी लंदन के डप्‍टफोर्ड डॉकयार्ड के हार्ड फोर शेयर से रिवर ली तक किया गया था। इसके बाद 1900 में गायरो मोनोरेल का परीक्षण किया गया। 1901 में इसका लिवरपूल से मैनचेस्टर के बीच प्रयोग भी किया गया।

1910 में गायरो मोनोरेल का प्रयोग अलास्‍का की खानों में कुछ समय तक किया गया। 1980 के बाद शहरीकरण के बढ़ने के साथ साथ ही जापान और मलेशिया में इसका बेहतर इस्‍तेमाल किया गया। आज टोकियो मोनोरेल विश्‍व का सबसे व्‍यस्‍त नेटवर्क है, जिसका प्रयोग हर रोज एक लाख सत्‍ताइस हजार यात्री करते हैं।

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