आषाढ़ी एकादशी / मुख्यमंत्री ठाकरे ने परिवार समेत भगवान विट्ठल की पूजा की, कोरोना को जल्द खत्म करने की प्रार्थना की

पंढरपुर में महापूजा में मुख्यमंत्री ठाकरे के साथ पाथर्डी में रुक्मिणी मंदिर की देखभाल करने वाले ज्ञानदेव बाडे और उनकी पत्नी को पूजा का मौका मिला।
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  • इससे पहले मंगलवार को राज्य के अलग-अलग हिस्सों से संतों की चरण पादुकाएं फूलों से सजी बसों में यहां पहुंची
  • 800 साल के इतिहास में यह पहली बार है जब चरण पादुकाएं पैदल की जगह किसी वाहन में रखकर यहां पहुंची हैं

दैनिक भास्कर

Jul 01, 2020, 02:07 PM IST

पंढरपुर. आषाढ़ी एकादशी के मौके पर बुधवार तड़के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने पत्नी रश्मि ठाकरे के साथ पंढरपुर में भगवान विट्ठल की पूजा की। इस महापूजन में उनके दोनों बेटे भी शामिल हुए। इस दौरान मुख्यमंत्री ने प्रदेश को जल्द कोरोना मुक्त करने की प्रार्थना की। 

उद्धव ठाकरे ने बताया कि पूजा के दौरान उन्होंने भगवान विट्ठल से कहा कि देश, राज्य और सारी दुनिया से कोरोना को नष्ट कर दें, आज से ही इस महामारी को खत्म कर दे। उन्होंने आगे कहा- मैंने कई बार मौली (भगवान विट्ठल) के चमत्कारों के बारे में सुना है। अब मैं वही चमत्कार फिर देखना चाहता हूं। 

इस महापूजा के बाद मुख्यमंत्री ठाकरे ने पाथर्डी में रुक्मिणी मंदिर की देखभाल करने वाले ज्ञानदेव बाडे और उनकी पत्नी को सम्मानित भी किया।

बदला-बदला था मंदिर परिसर का नजारा
आषाढ़ी एकादशी के अवसर पर विठ्ठल-रुक्मिणी के मंदिर को सफेद और गुलाबी फूलों से सजाया गया था। कोरोना संक्रमण के इस काल में 800 साल पुरानी परंपरा में बदलाव हुआ है। हर साला पंढरपुर में इस दिन लाखों लोगों का जमावड़ा होता है, लेकिन इस बार सिर्फ पास धारक लोगों को यहां आने की अनुमति थी। मंदिर परिसर में पहुंचे लोगों ने सोशल डिस्टेंसिंग के नियम को फॉलो किया। नियम को सही ढंग से पालन करवाने के लिए परिसर भी बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात था।

पूजा के दौरान मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और और उनकी पत्नी ने पाथर्डी के दंपती को नमन भी किया।

पहली बार बस से पंढरपुर आईं चरण पादुकाएं
इससे पहले मंगलवार को राज्य के अलग-अलग हिस्सों से संतों की चरण पादुकाएं फूलों से सजी बसों में यहां पहुंची। मंदिर परिसर को भी लाखों फूलों और एलईडी दियों से सजाया गया था। इतिहास में पहली बार हुआ है कि पंढरपुर यात्रा बस से तय की गई है। 800 वर्षों में ये तीसरी बार है कि पंढरपुर यात्रा बहुत ही सादगी से संपन्न हुई है।

पूरे मंदिर मरिसर को गुलाबी, सफेद और बैगनी फूलों और एलईडी लाइट्स से सजाया गया था।

800 साल में तीसरी बार कम हुई भक्तों की संख्या
800 साल से चली आ रही इस अनूठी पालकी यात्रा में तीसरी बार श्रद्धालुओं की संख्या को सीमित किया गया है। इससे पहले साल 1912 में प्लेग के चलते और 1945 में दूसरे विश्व युद्ध के चलते पंढरपुर में भक्तों की संख्या कम की गई थी। साल 2019 में हुई यात्रा में करीब 5 लाख लोग और 350 डिंडीयां शामिल हुईं थी। पुरानी परंपरा के अनुसार, महाराष्ट्र समेत देश के कोने-कोने से श्रद्धालु संत तुकाराम और संत ज्ञानेश्वर की पालकी लेकर पंढरपुर आते हैं।

यह पहली बार है जब ठाकरे परिवार इस शासकीय पूजा में शामिल हुआ है। 

पंढरपुर को कहा जाता है दक्षिण का काशी
महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में भीमा नदी के तट पर पंढरपुर प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। पंढरपुर को दक्षिण का काशी भी कहा जाता है। पद्मपुराण में वर्णन है कि इस जगह पर भगवान श्रीकृष्ण ने 'पांडुरंग' रूप में अपने भक्त पुंडलिक को दर्शन दिए और उनके आग्रह पर एक ईंट पर खड़ी मुद्रा में स्थापित हुए थे। हजारों सालों से यहां भगवान पांडुरंग की पूजा चली आ रही है। पांडुरंग को भगवान विट्ठल के नाम से भी जाना जाता है।

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