महाराष्ट्र / संत तुकाराम महाराज और संत ज्ञानेश्वर महाराज की चरण पादुका बस से पंढरपुर के लिए रवाना हुईं; कल मुख्यमंत्री पूजा करने पहुंचेंगे

बसों को रवाना करने से पहले इसे फूलों से सजाया गया था। इसमें सिर्फ 20 लोगों को दूर-दूर बैठने की अनुमति दी गई है।
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  • पुणे के कलेक्टर नवल किशोर राम ने आलंदी से बस को रवाना करने से पहले तुकाराम महाराज की पूजा भी की
  • इन दोनों संतों के अलावा संत सोपानदेव, चांगावटेश्वर देवस्थान की पादुकाएं आज शाम तक पंढरपुर पहुंच रही हैं

दैनिक भास्कर

Jun 30, 2020, 04:58 PM IST

पुणे. संत तुकाराम महाराज और संत ज्ञानेश्वर महाराज की चरण पादुका दो अलग-अलग बसों में पंढरपुर के लिए रवाना हुईं हैं। इन बसों में सिर्फ 20-20 लोग ही बैठे हैं। संत तुकाराम महाराज की पादुका देहू से रवाना हुई और आलंदी से ज्ञानेश्वर महाराज की चरण पादुका पंढरपुर के लिए चली हैं।

श्रद्धालुओं ने दोनों बसों को फूलों ने सजाया था। बसों में सवार हुए सभी लोगों ने चेहरे पर मास्क लगाया था। पुणे से चली यह बसें अब सीधे पंढरपुर में रुकेंगी। पहले इन पादुकाओं को हेलिकॉप्टर के जरिए पंढरपुर ले जाने की तैयारी थी। इन दोनों संतों के अलावा संत सोपानदेव, चांगावटेश्वर देवस्थान की पादुकाएं आज शाम तक पंढरपुर पहुंच रही हैं। पुणे के कलेक्टर नवल किशोर राम ने आलंदी से बस को रवाना करने से पहले तुकाराम महाराज की पूजा भी की।

पंढरपुर में कर्फ्यू लगाने का प्रस्ताव जिला प्रशासन को भेजा

सोलापुर पुलिस ने जिला प्रशासन को कोरोनावायरस के मद्देनजर आषाढ़ी एकादशी से पहले पंढरपुर में कर्फ्यू लगाने का प्रस्ताव भेजा है। हर साल आषाढ़ी एकादशी पर लाखों श्रद्धालु पंढरपुर में भगवान विठ्ठल के मंदिर आते हैं, जो इस साल एक जुलाई को है। सोलापुर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अतुल जेंडे ने बताया कि बाहर के लोग मंदिर के बाहर इकट्ठे ना हों, इसलिए हमने सोमवार को ही नाकेबंदी कर दी। उन्होंने कहा- पंढरपुर में आवाजाही प्रतिबंधित करने के लिए कर्फ्यू लगाने की भी योजना है। पंढरपुर में 30 जून से दो जुलाई तक कर्फ्यू लगाने के लिए एक प्रस्ताव सोलापुर कलेक्टर को भी भेजा गया है।

आषाढ़ी एकादशी के दिन पंढरपुर जाएंगे सीएम
मुख्यमंत्री ने ऐलान किया कि वह 1 जुलाई को आषाढ़ी एकादशी के दिन पंढरपुर के विट्ठल मंदिर में पूजा करने जाएंगे और भगवान से प्रार्थना करेंगे कि दुनिया को कोरोना के संकट से मुक्ति दिलाएं। पंढरपुर के मंदिर में पहली पूजा करने का सम्मान राज्य के मुख्यमंत्री को परंपरागत रूप से दिया जाता है। मुख्यमंत्री ने सभी धर्मों के लोगों को संकट के समय में अपने रीति-रिवाजों और त्योहारों को घरों में ही मनाने के लिए धन्यवाद दिया।

सिर्फ पास वाले ही मंदिर परिसर में जा सकेंगे
मंदिर प्रशासन ने जिन लोगों को पास दिया है, केवल वही धार्मिक परिसर में दाखिल हो सकेंगे। आमतौर पर लाखों लोग इस दौरान यहां आते हैं लेकिन कोरोना के प्रकोप को देखते हुए अधिकारियों ने उत्सव को इस साल सादगी से मनाने का निर्णय किया है।

800 साल में तीसरी बार कम हुई भक्तों की संख्या
800 साल से चली आ रही इस अनूठी पालकी यात्रा में तीसरी बार श्रद्धालुओं की संख्या को सीमित किया गया है। इससे पहले साल 1912 में प्लेग के चलते और 1945 में दूसरे विश्व युद्ध के चलते पंढरपुर में भक्तों की संख्या कम की गई थी। साल 2019 में हुई यात्रा में तकरीबन 5 लाख लोग और 350 डिंडीयां शामिल हुईं थी। पुरानी परंपरा के अनुसार महाराष्ट्र समेत देश के कोने-कोने से श्रद्धालु संत तुकाराम और संत ज्ञानेश्वर की पालकी लेकर पंढरपुर आते हैं।

पंढरपुर को कहा जाता है दक्षिण का काशी
महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में भीमा नदी के तट पर महाराष्ट्र का प्रसिद्ध धार्मिक स्थल पंढरपुर स्थित है। पंढरपुर को दक्षिण का काशी भी कहा जाता है। पद्मपुराण में वर्णन है कि इस जगह पर भगवान श्री कृष्ण ने 'पांडुरंग' रूप में अपने भक्त पुंडलिक को दर्शन दिए और उसके आग्रह पर एक ईंट पर खड़ी मुद्रा में स्थापित हुए थे। हजारों सालों से यहां भगवान पांडुरंग की पूजा चली आ रही है, पांडुरंग को भगवान विट्ठल के नाम से भी जाना जाता है।

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