• Hindi News
  • Local
  • Maharashtra
  • This Auto Seller Sold His House To Teach Granddaughter In Mumbai, The Story Went Viral; People Gave 24 Lakh Rupees

सोशल मीडिया ने बदल दी जिंदगी:मुंबई में पोती को पढ़ाने के लिए इस ऑटोवाले ने बेचा था अपना घर, कहानी हुई वायरल; लोगों ने दे दिए 24 लाख रुपए

मुंबईएक वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
अपने दोनों बेटों की मौत के बाद देसराज अपने परिवार के एकमात्र कमाऊ इंसान हैं। - Dainik Bhaskar
अपने दोनों बेटों की मौत के बाद देसराज अपने परिवार के एकमात्र कमाऊ इंसान हैं।

मुंबई में ऑटो चलाने वाले देशराज की कहानी कुछ दिन पहले सोशल मीडिया में वायरल हुई थी। देशराज ने अपनी पोती को पढ़ाने के लिए घर बेच दिया। इसके बाद वे उसी ऑटो को घर बनाकर उसमें रहने लगे। देशराज के दो बेटे थे। पहला बेटा घर से काम के लिए निकला था, लेकिन वापस नहीं लौटा। बाद में उसका शव बरामद हुआ था। इसके कुछ दिन बाद उसके दूसरे बेटे ने सुसाइड कर लिया। उनकी मौत के बाद देशराज अपने परिवार के एकमात्र सहारा थे। वे अपनी पत्नी, बहू, और अपने चार पोते का पेट पालने हर दिन ऑटोरिक्शा चलाते हैं।

सोशल मीडिया में यह कहानी वायरल हुई तो लोग देशराज की मदद के लिए आगे आए। अब क्राउड फंडिंग के जरिए देशराज के लिए 24 लाख रुपए जमा हो चुके हैं। हालांकि, उनके लिए सिर्फ 20 लाख रुपए का टारगेट रखा गया था।

झोपड़ी बेच पोती को दिल्ली पढ़ने भेजा
देशराज की बड़ी पोती ने इंटरमीडिएट में 80 प्रतिशत अंक हासिल किए थे। उन्होंने बताया कि इसके बाद उनकी पोती ने दिल्ली के एक कॉलेज से बीएड करने की इच्छा जताई थी। वे उसे वहां भेजने में असमर्थ थे। इसलिए उन्होंने अपना झोपड़ा एक लाख रुपये में बेच दिया। पोती के 80 प्रतिशत नंबर मिलने के बाद उन्होंने पूरे दिन लोगों को ऑटो में फ्री राइड दी थी।

पोते को गांव में पढ़ा रहे हैं देशराज
देशराज कहते हैं कि उन्होंने अपने पोते-पोतियों को बताया कि शिक्षा महत्वपूर्ण है। इसलिए ही उन्होंने अपने सभी पोते-पोतियों को अच्छी शिक्षा देने का संकल्प लिया है। बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करने भर की कमाई देशराज की नहीं थी। ऐसे में उन्होंने अपने पूरे परिवार को गांव भेज दिया है। वहां एक स्कूल में उनके सभी पोते पढ़ाई कर रहे हैं। देशराज की आर्थिक हालत को देखते हुए स्कूल के प्रिंसिपल ने उनके बच्चों की फीस माफ कर दी है।

एक फोन कॉल भुला देती है सारी थकान
ऑटो में रहने के अलावा देशराज उसी में खाते और सोते भी हैं। देशराज बताते हैं कि वह ये सब तकलीफ अपने पोते-पोतियों को पढ़ाने के लिए उठा रहे हैं। जब उनके पास उनकी पोती का फोन आता है तो वह सब दुख-दर्द भूल जाते हैं। जब उन्हें पता चलता है कि वह अपने क्लास में फर्स्ट आई है, तब वह गर्व से भर जाते हैं।

लॉकडाउन से कम हुई कमाई
एक इंटरव्यू में देशराज ने बताया था कि लॉकडाउन की वजह से देशराज की आय पर काफी असर पड़ा। उन्होंने बताया कि पूरे लॉकडाउन में वह ऑटो चलाते रहे। उन्होंने कई कोरोना मरीजों को भी अस्पताल पहुंचाया। उन्होंने बताया कि पहले वह 700-800 रुपए हर दिन कमा लेते थे। लेकिन, अब वह सिर्फ 300-400 रुपए प्रति दिन ही कमा पाते हैं। वह महीने में औसतन 10 हजार रुपए कमा लेते हैं। इसमें से वह अधिकांश अपने पोती के पास भेज देते हैं। बाकी हिमाचल प्रदेश के अपने गांव में परिवार के पास भेज देते हैं। उनकी पत्नी भी गांव में काम करती हैं।

​फुटपाथ वालों को बांट देते हैं अतिरिक्त कमाई
देशराज ने बताया कि वह साल 1958 में मुंबई आए थे। 10वीं तक की पढ़ाई उन्होंने यहीं की। 1985 में उन्होंने रिक्शा चलाना सीखा और शुरू किया। बीते एक साल से देशराज अपने ऑटो में सोते और खाते हैं। जब सवारी नहीं होती तो वह अपने ऑटो में ही बैठे रहते हैं। आर्थिक रूप से कमजोरी की मार झेल रहे देशराज बेहद दिलदार हैं। वह बताते हैं कि कभी-कभार जब उन्हें ज्यादा कमाई होती है वह इसे फुटपाथ पर रहने वाले लोगों में बांट देते हैं। उनके साथ ऑटो ड्राइवर उनकी बेहद इज्जत करते हैं।

खबरें और भी हैं...